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विभो
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जयशंकर प्रसाद आलोकपूर्ण सब लोकन में बिहारी।आनन्द कन्द जगवन्द्य विभो पुरारी॥ब्रह्मणाड मण्डल अखण्ड प्रताप जाके।पूरे रहैं निगम हूँ गण गाइ थाके॥ईशान नाम तव,नाथ अनाथ के हौंविख्यात है विरुद सद्गुण गाथ के हौं॥जो पै निहारि मम कर्महिं ध्यान दैहौ।तौ आशुतोष पद रूयातहिं को नसैहो॥जानी न जाय केहि कारण रीझते हौ। क्यों मूढ़ मानव जनों पर खीझते हौ॥प्यारे मनुष्य उरमध्य निवास तेरो।सन्मार्ग क्यों नहिं बतावहु जाहि हेरों॥वीणा सुतार नहिं सुन्दर साजती है।आनन्द राग भरि क्यों नहिं बाजती है॥गावो सुचित्त शुचि मन्दिर माहिं मेरे।पावो असीम सुख मोद महा घनेर॥हौं पातकी तदपि हौं प्रभु, दास तेरो।हौं-दास नाथ तब है हिय आस तेरो॥है आस चित्त महँ होय निवास तेरो।होवै निवास महँ देव! प्रकाश तेरो॥