वह करती है कोशिश
सुनीता भाटिया
वह करती है कोशिश अपनी मुट्ठी में कैद करने की बरसात की बूँदों को।चाहती है आर्द्र होकर इनसे सूखापन जिंदगी काकहीं, कभी तो नम हो जाए। वह सुबह-सुबहपत्तों पर पड़ेओस के कणों को देखकर सोचती हैकहीं, कभी तोइनकीठंडक हृदय की परतों पर पड़कर, छनकरदूर करेमन की जलन।वह छानती हैधूप की किरणों में
अपने सुख-दुख के कणऔर बीनती हैसुखों के कंकड़ उन कंकड़ों को भी वहछिटका देती है दूरकि, नन्ही चिड़ियाआस लगाए बैठी हैऔर देख रही हैउसके कणों को टुकुर-टुकर।