लो चल बसा....
- रमेश दत्त शर्मा
मुद्दत से था इंतजार, लो चल बसा। यारो तुम्हारा यार, लो चल बसा।।ख़ाली पेट ही खाता रहा धोखे।कितना था होशियार, लो चल बसा।। ज़मानेभर को शिकायत थी।आदमी था बेकार, लो चल बसा।।न जाने कितनों का क़र्ज बाकी था।छोड़कर उधार, लो चल बसा।। कोई तभी उससे ख़ुश नहीं था।सब लोग थे बेजार, लो चल बसा।।अब खुश रहो अहले वतन।एक ही था गद्दार, लो चल बसा।।रोने-धोने से अब क्या फ़ायदा।तुमने ही दिया मार, लो चल बसा।।बाद मरने के याद आएगा 'रमेश'था कितना खुद्दार, लो चल बसा।।