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यादें सुहानी ले गया
शरद तैलंग जब कबाडी़ घर से कुछ चीजे़ पुरानी ले गया, वो मेरे बचपन की यादें भी सुहानी ले गया। इस तरह सौदा किया है आदमी से वक्त़ ने,तज़ुर्बे देकर वो कुछ उसकी जवानी ले गया।दिन ढले जाकर तपिश सूरज की यूँ कुछ कम हुई,अपने पहलू में उसे सागर का पानी ले गया। आ गया अख़बार वाला हादिसे होने के बाद,बातों ही बातों में वो मेरी कहानी ले गया। क्या पता फ़िर ज़िन्दगी़ में उससे मिलना हो न हो,बस ’शरद’ ये सोचकर उसकी निशानी ले गया । साभार: स्वर्ग विभा