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याद आ जाते हो अक्सर...
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प्रियंका पांडेय याद आ जाते हो अक्सर...छत की मुंडेर पर बैठी देखती हूँ जब बारिश की बूँदों में छपछपाते तुमयाद आ जाते हो अक्सर मेरे इठलाते बचपन... छिपते-छिपाते कापियों से फाड़कर कागजो की कश्तियों में तैरते तुम उल्लास बन, जब भी गिरती हैं बूँदेयाद आ जाते हो अक्सरमेरे इठलाते बचपन...
घर का किवाड़ खोल, दबे पाँव, चुपके-चुपकेजब निकलते हो घर से,फिर मचाते हो उधम, लौटते हो कुछ कि जैसेमृदा में सनता हो बदन, याद आ जाते हो अक्सरमेरे इठलाते बचपन...माँ की उस चपत में, आँख मींचे तुम खड़े, फिर तुम्हारा रुदन-क्रंदन, आह वो मीठा सा भोलापन, याद आ जाते हो तुम अक्सरमेरे इठलाते बचपन...