यह भी कैसी होली है?
एनआरआई होली
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देश का मन में प्यार है, शोर और हुड़दंग नहीं,
वापसी का इंतजार है, गुब्बारे और कोई रंग नहीं
ना गेहूँ, ना धान की बाली, कब भीगेंगे सारे रंग में?
ना ही जीजा, ना ही साली!! कब झूमेंगे साथी-संग में?
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं
यह भी कैसी होली है?
क्या होली जब आपस में प्यार नहीं?
ना शैतानों की टोली है, ना भांग किसी ने घोली है
ना कचोरी, ना गुलाब-जामुन हैं...
न गुझिया, न लड्डू न पेड़े हैं...
ना रंग से भीगे बाल हैं
ना कपड़ों पर बिखरा हुआ गुलाल है
ना नचैयों की धमाल है
ना पिचकारी की धार है ना भीगे रिश्तेदार हैं
यह भी कोई होली है- जब चुप्पी सब की बोली है?
यह भी कैसी होली है?
पर कुछ नहीं है तो क्या-
अपनी बातों की मिठास है
जब गुझिया बेशुमार नहीं
अपने सपने कुछ खास हैं
ठहाकों की भरमार नहीं...
दिल-ही-दिल में आँख मिचौली खेलें,
ना गाल पीले-लाल हैं आओ,
बिना रंग के होली खेलें!!
फिर सोचें यह भी कैसी होली है।
