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यह उजली कौंध
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सत्यवान समय ने कहाँ पहचाना कबीर, तुलसी या नानक की बानी को यह तो उनकी फितरत थी जिसे नहीं मिटा सकी समय की मार फिर, मुझे कौन पहचाने एक उल्का-पिंड की कौंध लिए अपशगुन की तरह लोगों के सामने से गुजर जाता हूँ उन्हें कहाँ विश्वास यह उजली कौंध अँधेरे वातावरण की रगड़ से अपने को जलाकर पैदा करता हूँ।