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Written By WD

यह उजली कौंध

कविता
- सत्यवान

NDND
समय ने कहाँ पहचाना
कबीर, तुलसी या नानक की बानी को
यह तो उनकी फितरत थी
जिसे नहीं मिटा सकी समय की मार

फिर, मुझे कौन पहचाने
एक उल्का-पिंड की कौंध लिए
अपशगुन की तरह
लोगों के सामने से गुजर जाता हूँ

उन्हें कहाँ विश्वास
यह उजली कौंध
अँधेरे वातावरण की रगड़ से
अपने को जलाकर पैदा करता हूँ।