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मौसम
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राहुल उपाध्याय पतझड़ के पत्तेजो जमीं पे गिरे हैंचमकते-दमकतेसुनहरे हैं।पत्ते जो पेड़ परअब भी लगे हैंवो मेरे दोस्त,सुन, हरे हैंमौसम से सीखोराज़ इसमें बड़ा हैजो जड़ से जुड़ा हैवो अब भी खड़ा हैरंग जिसने बदलावो कूढ़े में पड़ा है
घमंड से फ़ूलाघना कोहरासोचता है देगासूरज को हराहो जाता है भस्ममिट जाता है खुदसूरज की गर्मी सेहार जाता है युद्धमौसम से सीखोराज़ इसमें बड़ा हैघमंड से भराजिसका घड़ा हैकुदरत ने उसेतमाचा जड़ा है