मोती जैसे दमक रहे हो
अश्वघोष
एक अजब सी उलझन मन में
जाने क्यों है पुलकन तन में
पता नहीं तुम कहाँ समाए
तुम्हें खोजते व्याकुल साए
तुम्हें देखकर आ जाता हूँ
सहसा ही मैं अपनेपन में
चंदा जैसा रूप तुम्हारा
मन में हिलता जैसे पारा
जब तक तुम प्राणों में रहते
तब तक रहती धड़कन तन में
तुम फूलों में चमक रहे हो
मोती जैसे दमक रहे हो
तुम बिना सदा अँधेरा रहता
मेरे जीवन के आँगन में।
साभार : अक्षरा
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एक अजब सी उलझन मन में
जाने क्यों है पुलकन तन में
पता नहीं तुम कहाँ समाए
तुम्हें खोजते व्याकुल साए
तुम्हें देखकर आ जाता हूँ
सहसा ही मैं अपनेपन में
चंदा जैसा रूप तुम्हारा
मन में हिलता जैसे पारा
जब तक तुम प्राणों में रहते
तब तक रहती धड़कन तन में
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तुम फूलों में चमक रहे हो
मोती जैसे दमक रहे हो
तुम बिना सदा अँधेरा रहता
मेरे जीवन के आँगन में।
साभार : अक्षरा
