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Written By WD

मैं अपरिचिता

डॉ. सत्य कमलाकर वज्झला

हिन्दी कविता
WD


आदि-शक्ति से आधुनिका तक
मेरी यात्रा बड़ी अनोखी
देवी बनकर गई उपासी
रही पुरुष की प्राण-सखी

ईश-निवेदन में होता जब
सृष्टि-नाट्‍य का सफल प्रदर्शन
कभी अधिष्ठित सिंहासन पर
कभी झेलती निर्मम शोषण

वेद-गिरा में हूं स्तुत्य प्रकृति
और पुराणों की पतिव्रता
मध्य-युगों की मादक मदिरा
आज सबों की मैं अपरिचिता

जनक-सुता बन त्रेता में दी
लोक-तुष्टि की अनल परीक्षा
पांडव पत्नी बन प्रणयन की
चीर-हरण की नई समीक्षा

लय-कारक की अर्धांगिनी हूं
या आदम की हड्डी-पसली
अस्मिता की यह दुष्कर प्रश्न
पाएगा कब उत्तर असली

श्रद्धा बनकर जग में आई
प्रथम-पुरुष को राह दिखाई
प्रत्युत्तर में ठोकर खाई
फिर भी क्यों कुछ समझ न पाई

लेखनियों की जंजीरों में,
दरबारों के कारागृह में,
प्रखर-वासना की ज्वाला में,
धवल-महल की समाधियों में,

घुटकर भुनकर मरना ही क्या
भाल-फलक पर लिखा गया है?
प्रवंचना के अंधड़ में कथा
शुष्क-पत्र सम उड़ना है?

नरक द्वारा कह नारी को नर
घृणित वस्तु-सा तिरस्कारता
नरम धरा है नारी वरना
नर-अंकुर क्या स्वयं पनपता?