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मुझमें तलाश करते हो तुम
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सादिक़ मुद्दत से हम खड़े हैं बस इतनी चाह मेंमिल जाएँ वो हमें किसी रोज राह मेंआशाएँ कर रहे थे सभी सतह देखकरकुछ भी हाथ न आया मगर जा के थाह में मंजिल नहीं मिली तो हमें कोई गम नहींकि दूर तक तो साथ चले उनके, राह मेंमुझमें तलाश करते हो तुम जो भी खूबियाँवो तो मिलेंगी तुमको किसी बादशाह मेंयह मौलवी था आदमी अच्छा-भला मगरक्या बन गया है देखिए हूरों की चाह मेंआम आदमी के पक्ष में संसद तो थी मगरघर का बजट बगड़ गया अप्रैल माह में।साभार-समकालीन साहित्य समाचार