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Written By WD

मुझमें तलाश करते हो तुम

सादिक़
- सादिक़
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मुद्दत से हम खड़े हैं बस इतनी चाह में
मिल जाएँ वो हमें किसी रोज राह में

आशाएँ कर रहे थे सभी सतह देखकर
कुछ भी हाथ न आया मगर जा के थाह में

मंजिल नहीं मिली तो हमें कोई गम नहीं
कि दूर तक तो साथ चले उनके, राह में

मुझमें तलाश करते हो तुम जो भी खूबियाँ
वो तो मिलेंगी तुमको किसी बादशाह में

यह मौलवी था आदमी अच्छा-भला मगर
क्या बन गया है देखिए हूरों की चाह में

आम आदमी के पक्ष में संसद तो थी मगर
घर का बजट बगड़ गया अप्रैल माह में।

साभार-समकालीन साहित्य समाचार
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WD