माटी के घर सी छाँव
नंदलाल भारती
एक-एक टोकरी माटी को जोड़कर
खड़ा था एक घर!
जला करता था, नन्हा सा दीया जहाँ ड्योढ़ी पर!
जिसे सब पहचानते थे
छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब भी!
माँ की तपस्या और त्याग के बलबूते खड़ा था यह घर!
घर के सुकून में शामिल था
बाप का पुरुषार्थ और रिश्ते का सौंधापन भी!
दुनिया की चकाचौंध से दूर
पहुँचा जा सकता था जहाँ
कच्ची सड़कों या पगडंडियों से होकर!
जहाँ उगता है सूरज पहले आज भी!
उतरा करती थी,
खुशी के झोंके की हवा!
तंगी में भी जहाँ होता था माँ का हाथ दवा!
माँ की तपस्या और,
बाप के पुरुषार्थ से खड़े घर पर!
कागा दृष्टि पड़ गई,
टुकड़े-टुकड़े हो गया
माटी के ढेलों पर भी कब्जा हो गया!
रिश्ते के ही लोगों ने आतंक मचा दिया!
रोटी रोजी को तलाशता मैं भी,
पहुँच गया गाँव से दूर बहुत दूर
ईंट पत्थरों के शहर में!
एक आशियाना
मैंने भी खड़ा कर लिया!
अपनी साठ साल तक की उम्र को बेचकर!
आसपास जहाँ लोग तो बसते हैं,
पर जिंदा लाश होकर!
बेचैन हो जाता हूँ रह रहकर!
ढूँढता हूँ,
मानवीय रिश्तों की सुगंध और,
अपनेपन का एहसास भी!
नहीं मिलती है कहीं
माटी के घर सी छाँव
नहीं सौंधेपन का भाव पुराने गाँव सा!
ईंट पत्थरों के शहर में
कैद हो गया हूँ जैसे, बड़ी-बड़ी इमारतों से घिरे
परिश्रम के ईंट, पसीने के गारे की नींव पर टिके अपने ही घर में!!
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खड़ा था एक घर!
जला करता था, नन्हा सा दीया जहाँ ड्योढ़ी पर!
जिसे सब पहचानते थे
छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब भी!
माँ की तपस्या और त्याग के बलबूते खड़ा था यह घर!
घर के सुकून में शामिल था
बाप का पुरुषार्थ और रिश्ते का सौंधापन भी!
दुनिया की चकाचौंध से दूर
पहुँचा जा सकता था जहाँ
कच्ची सड़कों या पगडंडियों से होकर!
जहाँ उगता है सूरज पहले आज भी!
उतरा करती थी,
खुशी के झोंके की हवा!
तंगी में भी जहाँ होता था माँ का हाथ दवा!
माँ की तपस्या और,
बाप के पुरुषार्थ से खड़े घर पर!
कागा दृष्टि पड़ गई,
टुकड़े-टुकड़े हो गया
माटी के ढेलों पर भी कब्जा हो गया!
रिश्ते के ही लोगों ने आतंक मचा दिया!
रोटी रोजी को तलाशता मैं भी,
पहुँच गया गाँव से दूर बहुत दूर
ईंट पत्थरों के शहर में!
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मैंने भी खड़ा कर लिया!
अपनी साठ साल तक की उम्र को बेचकर!
आसपास जहाँ लोग तो बसते हैं,
पर जिंदा लाश होकर!
बेचैन हो जाता हूँ रह रहकर!
ढूँढता हूँ,
मानवीय रिश्तों की सुगंध और,
अपनेपन का एहसास भी!
नहीं मिलती है कहीं
माटी के घर सी छाँव
नहीं सौंधेपन का भाव पुराने गाँव सा!
ईंट पत्थरों के शहर में
कैद हो गया हूँ जैसे, बड़ी-बड़ी इमारतों से घिरे
परिश्रम के ईंट, पसीने के गारे की नींव पर टिके अपने ही घर में!!
