बच्चा इतना मनोहर है जितनी बहती हुई मीठी हवा जब मैं सो रही होऊँ मुझे आभास तक न हो कि कर रहा वह स्तनपान बच्चा उस नदी से ज़्यादा मीठा है जो अपने मोड़ के साथ करती पहाड़ी की परिक्रमा
मेरा शिशु उस दुनिया से ज़्यादा सुंदर है जिस पर डालता है वह अपनी कोमल निगाह स्वर्ग और पृथ्वी पर उपलब्ध धन-धान्य से अधिक परिपूर्ण है यह शिशु
मेरे स्तनों पर तसल्ली मेरे गीतों में मखमली स्पर्श
इतनी छोटी है उसकी नन्ही देह लगता है जैसे कोई नन्हा-सा सुंदर बीज
स्वप्नों के भार से भी हल्का कोई नहीं देख पाता उसे लेकिन हुआ जाता वही मेरा
अनुवाद- नरेंद्र जैन (पहल की पुस्तिका ‘पृथ्वी का बिंब’ से साभार)