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Written By WD

भीतर का पेड़ उग रहा है

- चम्पा वैद

कविता
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भीतर का पेड़ उग रहा है
जिसके बीज मैं निगल गई थी बचपन में
इसके बड़े होने में पूरे साठ वर्ष लग गए
मेरी नसें इसकी जड़ें हैं
मेरी नाड़ियां इसकी शाखाएं
मेर विचार इसके छोटे बड़े पत्ते
शब्द भीतर अपनी जगह बनाते
उगलने लगते हैं
पिछला सब करा धरा।



साभारः
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WD