बेल कितनी दोगली है
त्रिमोहन
एक सुखा पेड़, और उस पर झूमती छतनार सी बेल कितनी दोगली है? एक आश्वासन दिया था छाँव काऔर आश्रय का लिया था वर। नाम अपमानित हुआ है गाँव का, खोद टाले प्रहरियों ने घर। एक कुंठित मौन हर द्वारे टंगा है, और चर्चा हर गली है। बेल कितनी दोगली है। कल जिन्हें सूरज उगाने को कहा, आज तक सोए हुए हैं वे? और वे जिनने अँधेरों को सहा, रोज अपनी आँख मलते थे। बात निबटा दे अर्थ तो बहुत है, रात ही वरना भली है बेल कितनी दोगली है। दृष्टिहीनों के शहर में भी आईनों को बेचता काना। बाहु-बल भी हार कब माना? कुर्सियों की इस लड़ाई में वोट की पतली गली है। बेल कितनी दोगली है।