1. लाइफ स्‍टाइल
  2. »
  3. साहित्य
  4. »
  5. काव्य-संसार
  6. बाकी सब ठीक ही है...।
Written By WD

बाकी सब ठीक ही है...।

काव्य-संसार

कविता
मल्लिका अमर शेख
ND
मैं तरह-तरह की आवाजें सुनती हूँ
जिस तरह मेरे घर का फर्नीचर
और दीवारें सुनती हैं

मैं बुनती हूँ मेरे लिए अंधेरे का महीन वस्त्र
इच्छाओं के कई बर्तन खनकाते हुए

मैं खाना बनाती हूँ
मैं खरीद सकती हूँ दुख की तरह चमचमाते जेवर
मैं घंटों बातें कर सकती हूँ-

एक ही सब्जी कैसे बनती है पचासों तरीकों से
मैं पढ़ सकती हूँ सुबह के सभी अखबार-
जलसे, हादसे, राजनीतिक घटनाएँ

पढ़कर भी मैं खुद को पता नहीं चलने देती हूँ
कि क्या चल रहा है दुनिया में आजकल

मैं देखकर साफ करती हूँ कमरा, मछली, कपड़े
और पति के माथे की सिलवटें

मैं सोच भी सकती हूँ
कि ताजे सलाद में विटामिन होते हैं
और बैंक में पैसे जमा करने चाहिए
मैं चल सकती हूँ देर तक पति के पीछे-पीछे
ND
मुझे पूरा हक मिलता है
अपने घर को सजाने-सँवारने का
जब चाहे टी.वी. देखने का
दोपहर में नींद में करवटें बदलने का
अगर इच्छा हो तो कभी-कभी
घर को रंग देने का मौका भी मुझे मिल जाता है-

कोई रोक-टोक नहीं
मैं आसानी से घूम सकती हूँ
इस कमरे से, उस कमरे तक

दीवार, छत और बाहर टंगे हुए मैं
आसमान का छोटा टुकड़ा देख सकती हूँ

सिर्फ हाथों में बँधी
जंजीर की आवाज से
मैं गूंगी-बहरी जरूर हो जाती हूँ
कभी-कभी

लेकिन बाकी सब ठीक ही है।
लेखक के बारे में
WD