बाकी सब ठीक ही है...।
काव्य-संसार
मल्लिका अमर शेख मैं तरह-तरह की आवाजें सुनती हूँ जिस तरह मेरे घर का फर्नीचर और दीवारें सुनती हैंमैं बुनती हूँ मेरे लिए अंधेरे का महीन वस्त्रइच्छाओं के कई बर्तन खनकाते हुएमैं खाना बनाती हूँमैं खरीद सकती हूँ दुख की तरह चमचमाते जेवरमैं घंटों बातें कर सकती हूँ-एक ही सब्जी कैसे बनती है पचासों तरीकों सेमैं पढ़ सकती हूँ सुबह के सभी अखबार-जलसे, हादसे, राजनीतिक घटनाएँपढ़कर भी मैं खुद को पता नहीं चलने देती हूँ कि क्या चल रहा है दुनिया में आजकलमैं देखकर साफ करती हूँ कमरा, मछली, कपड़ेऔर पति के माथे की सिलवटेंमैं सोच भी सकती हूँ कि ताजे सलाद में विटामिन होते हैंऔर बैंक में पैसे जमा करने चाहिएमैं चल सकती हूँ देर तक पति के पीछे-पीछे
मुझे पूरा हक मिलता हैअपने घर को सजाने-सँवारने का जब चाहे टी.वी. देखने कादोपहर में नींद में करवटें बदलने काअगर इच्छा हो तो कभी-कभीघर को रंग देने का मौका भी मुझे मिल जाता है-कोई रोक-टोक नहींमैं आसानी से घूम सकती हूँ इस कमरे से, उस कमरे तकदीवार, छत और बाहर टंगे हुए मैंआसमान का छोटा टुकड़ा देख सकती हूँ सिर्फ हाथों में बँधीजंजीर की आवाज सेमैं गूंगी-बहरी जरूर हो जाती हूँ कभी-कभीलेकिन बाकी सब ठीक ही है।