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बच्चे और फूल - दो
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रवि कुमार बच्चे उदास है उनके जादुई पिटारे में सहेजे फूल मुरझा गए हैं नहीं शायद वे सोच रहे हैं कि मर गए हैं वे सदमे में हैं कल्पनालोक घायल हैरंग खो गए हैं कहीं खुशबुएँ सड़ांध मारने को है सारी चेतावनी और नसीहतें उनकी आँखों में उतर आए पानी में फूलों और तितलियों के साथ बेतरतीबी से चिलक रही हैं जादुई पिटारे की रहस्यमयी दुनिया कुछ समय के लिए खामोश हो गई है बच्चे आखिरकार बच्चे हैं फूलों को फिर से देखते ही कौंध उठती है उनकी आँखों में वही चमकउनके कल्पनालोक में उन्हें सहेजने के नये-नये इंतजामात कुलबुलाने लगते हैं वे फिर से नजरे बचाकर पहुँच जाना चाहते हैं फूलों और तितलियों के पास कुछ सिरफिरे कहते हैं फूलों और खुशबुओं को सहेजना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है इस दुनिया को बचाए रखने के लिए।