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बचपन की बात कुछ और थी
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मणिमोहन मेहता बचपन की बात और थीजब पिता के जूतों में पाँव डालकरनचते फिरते थे घर भर मेंदाएँ पैर का जूता बाएँ में औरबाएँ पैर का दाएँ मेंकितना चिल्लाती थी माँपिता की मार भी खाई कई बारजब एक जूता आँगन मेंऔर दूसरा बैठक में मिला...एक अजीब सा आकर्षण थापिता के जूतों मेंगिरना, पड़ना, चलना सब सीखाइन्हीं जूतों के सहारेपर ये सब बचपन की बातें हैंअब कहाँ इतनी हिम्मतकि डालूँ पिता के जूतों में अपने पाँव चलना सीख गया हूँ इसलिए या फिर चल न सकूँगा इन्हें पहनकर इसलिएडरता हूँ
बरसों पुरानी कोई जंग खाई कीलया अंदर छुपे किसी काँटे सेया शायद डरता हूँमीलों लंबी उस थकान सेजो अँधेरे की चादर ओढ़ेआराम से पसरी हैजूतों की सुरंग के भीतरबचपन की बात कुछ और थी । साभार : वागर्थ