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फागुन खड़ा दुआर पर
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कृष्णानंद कृष्ण फागुन खड़ा दुआर पर, ले अबीर के थाल।आँखिन-आँखिन में करे, धनिया मूक सवाल॥मस्त गुलाबी मद भर ल, फागुन के ई धूप।चंचल मन ना थिर रहे, निरख चंपई रूप॥पोर-पोर फूले कदम, तन-मन भइल पलास।आग लगा कइसन गइल, ई फागुनी बतास॥मधुमातल सहकल हवा, महकल-महकल भोर।बउराइल फागुन गजब, गली-गली में शोर॥ रंग जमा फागुन गइल, कर सोरह सिंगार।अलमाइल मौसम अजब, गोरी लेत उसाँस॥बाग-बगइचा सज गइल, गमला में मधुमास।चहल-पहल का बीच में, काहे कृष्ण उदास॥रूप शरद के चाँदनी, देख चिहाइल लोग।मन चंचल तिरपति भइल, कइसन माया योग॥तन-मन कंचन अस भइल, नैन भइल रतनार।गंध-गुलाबी देह के, महके अँगना-द्वार।भरल कटोरा प्रेम के, ढरकल अँगना-द्वार।ताजमहल अइसन खड़ा, ऊ जमुना के पार॥साभार : मसि-कागद