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Written By WD

फागुन खड़ा दुआर पर

फागुन
-कृष्णानंद कृष्
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फागुन खड़ा दुआर पर, ले अबीर के थाल।
आँखिन-आँखिन में करे, धनिया मूक सवाल॥

मस्त गुलाबी मद भर ल, फागुन के ई धूप।
चंचल मन ना थिर रहे, निरख चंपई रूप॥

पोर-पोर फूले कदम, तन-मन भइल पलास।
आग लगा कइसन गइल, ई फागुनी बतास॥

मधुमातल सहकल हवा, महकल-महकल भोर।
बउराइल फागुन गजब, गली-गली में शोर॥

रंग जमा फागुन गइल, कर सोरह सिंगार।
अलमाइल मौसम अजब, गोरी लेत उसाँस॥

बाग-बगइचा सज गइल, गमला में मधुमास।
चहल-पहल का बीच में, काहे कृष्ण उदास॥

रूप शरद के चाँदनी, देख चिहाइल लोग।
मन चंचल तिरपति भइल, कइसन माया योग॥

तन-मन कंचन अस भइल, नैन भइल रतनार।
गंध-गुलाबी देह के, महके अँगना-द्वार।

भरल कटोरा प्रेम के, ढरकल अँगना-द्वार।
ताजमहल अइसन खड़ा, ऊ जमुना के पार॥

साभार : मसि-कागद