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Written By WD

प्रतिशोध की ज्वाला

पंकज त्रिवेदी

प्रतिशोध की ज्वाला
ND
प्रतिशोध की ज्वाला
भड़क रही है मेरे अंदर
घुटन सी महसूस होती है
निराशा भी हैं,
धोखा भी हैं,
आशा-अपेक्षा की नींव पर
खड़ी थी सपने की ईमारत
वो भी अब गिर चुकी हैं
किस तरह से जीना होगा मुझे
यह भी नहीं पता था मगर
हर पल सबको साथ लेकर
किसी के एक बोल पर दौड़ता रहता
और
न जाने क्यूँ ? कुछ नहीं कहना हैं मुझे......
जाने दो उस बात को.........
अब मैं -
जो भी हो....
खत्म होना हैं मुझे
लोग चाहें जिस तरह भी खत्म करें
मैं उन्हें सहयोग देता रहूँगा
मगर -
अपनी इंसानियत को,
अपनी आत्मा को,
कभी भी खत्म नहीं होने दूँगा... !!
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