स्मृति तुम तुम कभी मुझे समझ नहीं सकें इसीलिए मैं और तुम कभी हम नहीं बन सकें।
मैं मैं कभी तुम्हारी नहीं हो सकी क्योंकि हर वक्त आड़े आ गया मेरा 'मैं' और तुम्हारा ' मैं' ।
हम हम 'हम' कभी नहीं हो सकें क्योंकि हम इसी 'वहम' में रहें कि हमारा 'अहम' नहीं रहा । जबकि हर बार हम में 'व' और 'अ' रहा। वहम और अहम 'हम' कैसे हो सकते हैं?