टूटने की यह कहानी
- विद्यानंदन राजीव
नींद टूटी और स्वर्णिम स्वप्न टूटेथम नहीं पाई अभी तकटूटने की यह कहानी!सोचते जब चल पड़ेंपरछाइयों का साथ छोड़ेंसामने अवरोध, उनकीउठ रही बाहें मरोड़ें,समय की घातक व्यवस्थाहौसलों को तोड़ देतीऔर गतिकामी चरण कोआँधियों में छोड़ देती,किंतु अचरज, नहीं अब तकजिन्दगी में हार मानी।झेलती प्रतिरोध सारेअस्मिता फिर भी बनी हैफिसल जाती, फिर संभालतीआस्था कितनी घनी है,हर कदम रण-भूमि में हैऔर प्रतिपल का समर हैघात पर आघात सहकरहौसला होता प्रखर है,आग का दरिया, कमी हैराह पर घातक हिमानी!थम नहीं पाई अभी तकटूटने की यह कहानी!