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जीने की कोशिश जारी है
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चंद्रसेन विराट प्रिय किसको भुजपाश नहीं हैइसकी किसे तलाश नहीं है।जीने की कोशिश जारी हैजीने का अवकाश नहीं है।अनगढ़ता-सौंदर्य मूर्ति कीतीखी तेज तराश नहीं है।बँट तो चुकी धरा यह पूरीबँटा अभी आकाश नहीं है।फूल नुमाइश में सब शहरीइनमें ग्राम्य पलाश नहीं है।चौंके सारे मित्र आधुनिकमेरे घर में ताश नहीं है।मेरा कत्ल हुआ, मिल पाईलेकिन मेरी लाश नहीं है।सृजन नहीं है किस विनाश काकिस निर्मिति का नाश नहीं है।जला रही वह आग कि जिसमेंलपटें मगर प्रकाश नहीं है।वह भी क्या उपलब्धि कि कोईकहने को शाबाश नहीं है।इतना मानव-पतन किंतु कविदुःखी जरूर, हताश नहीं है।