चार बूँद गिरी हैं ज़मीन पर
रोहित जैन मेरे ख़ुदा इसे किसी काबिल बनाइए कुछ ग़म इसे भी दीजिए और दिल बनाइए कब तक मुग़ालते में रहूँ नाख़ुदा के मैं साहिल को मौज, मौज को साहिल बनाइए ये इम्तिहाँ भी देखिए मैंने किया है पारकुछ और मेरी ज़ीस्त को मुश्किल बनाइए ये बर्क़ मेरे घर को जला ही नहीं सकीइसकी तपिश को मेरे मुक़ाबिल बनाइए ये क्या के चार बूँद गिरी हैं ज़मीन परखंजर को आप देखिए क़ातिल बनाइएकब तक मै सरे राह भटकता रहूँ ख़ुदाकोई तो मेरी राह में मंजिल बनाइए शामिल मेरी रुसवाई में सारा शहर यहाँएकाध शख़्स दिल में भी शामिल बनाइए जब तक जिया वो कोई जश्न कर नहीं सकामय्यत को ही 'रोहित' की अब महफ़िल बनाइए।