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Written By WD

गुमशुदा दीप

गुमशुदा दीप
श्रीकांत साकल्ले
ND
कृपया ध्यान दें, दिलाएँ भी
सुने-गुने, सबको समझाएँ भी
हमारा पथप्रदर्शक
मानवता के शहर से
घुटन की दोपहर से
मिलावटी ज्ञान
जमाखोरी ईमान
महँगे गुमान
आशंकित फरमान
जब हुआ बेजुबान
बुद्ध मन
पंचशील सिसकन
बस, इतना ही हुलिया
मुँहबोला नाम है दिया
रात का पिया
अँधियारे शूज
मटियाली जुराबें ढीली
बाती सी महीन धोती पर
नेहमय अचकन पीली
ज्योति तिलक भाल
चिंति‍त बेहाल
चाहता बस सभी को निहाल
संक्रमित संस्कृति की
आशंकित अमावसी रात
अनगिन आस्थाओं की
अलोकित पौराणिक सौगात
घर-द्वारे सज-धज यदि आएँ
आत्मदीपोभव मंगल गाएँ
समझों कि धन्य हुआ धाम
प्रहरी सुदीप तुम्हें
शत-शत प्रणाम !!