गर्म हथेली पर घुलती ओस
रश्मि रमानी
थका हुआ सूरज सिमट गया है रंगों से भरी शाम की आत्मीय बाँहों में आसमान में बिखरे हैं रंग, बेपनाह, बेतरतीब, पाम के पेड़ स्तब्ध हैं और जंगल से आती हुई हवा चुप। यह शाम सिर्फ शाम ही नहीं है अतीत की किताब का एक फटा हुआ पन्ना भी हैदूर क्षितिज में जहाँ मिल रहे हैं धरती और आसमान समंदर खोया है अपने आप में
एक लड़की अपलक देख रही हैरंगों से नहाए आसमान को कुतर रही है नाखून और याद कर रही है बीते दिनों को ओस की बूँद की तरह किसी फूल के होंठों पर घुलने की इच्छा रखने वाली लड़की घुल गई है किसी गर्म हथेली पर।