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Written By WD

गर्म हथेली पर घुलती ओस

रश्मि रमानी

रश्मि रमानी
ND
थका हुआ सूरज सिमट गया है
रंगों से भरी शाम की आत्मीय बाँहों में
आसमान में बिखरे हैं रंग, बपनाह, बेतरतीब,
पाम के पेड़ स्तब्ध हैं
और जंगल से आती हुई हवा चुप।

यह शाम सिर्फ शाम ही नहीं है
अतीत की किताब का
एक फटा हुआ पन्ना भी है
दूर क्षितिज में जहाँ मिल रहे हैं
धरती और आसमान
समंदर खोया है अपने आप में
ND
एक लड़की
अपलक देख रही है
रंगों से नहाए आसमान को
कुतर रही है नाखून
और याद कर रही है बीते दिनों को
ओस की बूँद की तरह
किसी फूल के होंठों पर
घुलने की इच्छा रखने वाली लड़की
घुल गई है
किसी गर्म हथेली पर।
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WD