कितनी भोली है बसंती
वीणा अग्रवाल
कितनी भोली है बसंतीसचमुच बसंती चेहरा खिली-खिली धूप-सी मुस्कानसुबह-सुबह उसे देखकर मिट जाती है थकानमेरे अंगूठे की चोट में उसने मुझे दिया था कितना आरामजब कभी बरतन से टकराकर मेरे हाथ में दर्द हो जाताऐसा लगता जैसे उसका हृदय दर्द से तड़प जातामैं सोचती यह मेरे कितने करीब हैंइतनी प्यारी-सी बेटी जाने क्यों गरीब हैलेकिन उसने गरीबी का एहसास कभी होने नहीं दियाअपने चुलबुले युवा मन कोकभी रोने नहीं दियासच पूछो तो मानवता का धर्म तो गरीब निभाते हैंहम अमीर तो बस केवल आडम्बर दिखाते हैंउसके व्यवहार में सच्चाई हैतभी तो वह मेरे दिल में समाई हैउसके आने से मेरा घर महकता हैउसके खिलखिलाने से मेरा आंगन चहकता हैउसकी उदासी से मेरे घर कीदीवारें उदास हो जाती हैंसोचती हूं-यह नन्ही-सी जानजो है मेरे घर की मेहमानइसके भी तो होंगे कुछ अरमान एक दिन ससुराल चली जाएगीएक अनजानी बेटी कब बिछुड़ जाएगी।