कितना अच्छा होता है
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
कितना अच्छा होता हैएक-दूसरे को बिना जानेपास-पास होनाऔर उस संगीत को सुननाजो धमनियों में बजता है,उन रंगों में नहा जानाजो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।शब्दों की खोज शुरू होते हीहम एक-दूसरे को खोने लगते हैंऔर उनके पक़ड़ में आते हीएक-दूसरे के हाथों सेमछली की तरह फिसल जाते हैं। हर जानकारी में बहुत गहरेऊब का पतला धागा छिपा होता है,कुछ भी ठीक से जान लेनाखुद से दुश्मनी ठान लेना है।कितना अच्छा होता हैएक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,और अपने ही भीतर दूसरे को पा लेना।