कदमों के निशाँ
- पंकज त्रिवेदी
मैं जानता हूँ कि -तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना हैतुम्हें अपनी पहचान बनानी हैंतुम हो कि उसके लिएचाहे कुछ भी क्यूँ न करना पड़े!जिंदगी के आयामों को अपनेकब्जे में करना औरआसमाँ को छूने की तुम्हारीहसरत हमेशा से रही हैं!मगर जिंदगी यही हैं आज के दौर मेंकिसी के सर को कुचल दोकिसी की इज्जत को सरे आम नीलाम कर दोकिसी की भावनाओं से खेलो...या फिर -किसी के आगे अपने अस्तित्त्व को झुका दोखुद को भूलकर दूसरों में खुद को ढूँढोंफिर जो असर होगा उसको भी भूल जाओदुनिया वाले हैं, कहेंगे यार! कुछ दिनों की तो बात हैं... सुन लेना....यही तो है शॉर्टकट! यही तो हैं सफलता की पायदानयही तो हैं खुद को रोशन दिखाने की चाहमगर -जो छूटता है, जो छोड़ता हैं, वही आखिर जीतता हैं! शायद यही सबसे बड़ी सफलता परचाहे कितनी भी धूल झोंक दो...सफलता किसी की मोहताज नहीं होतीन उसे सीढ़ियों की जरूरत होती हैं न किसी कीतारीफ की..!सफलता खुद आनी चाहिए हमारे पुरुषार्थ कीऊँगली पकड़ती हुई,खेलनी चाहिए हमारे आँगन में...जहाँ हमारे कदमों के निशाँ कोकोई मिटा नहीं सकता और वहीं पर ताँता लगता हो...!!