...और हमारी ईद होगी
दीपाली पाटील
हर सुबह ख्वाबों के कितने मोती मन के कोने में छुपा देती हूँफिर जाने कहाँ से सामने आता है वो ईद की सुबह सा चाँद से उजले लिबास मेंफरिश्तों की तरहउलझनों से मुझको घिरा पाता है जब भी फिर मुस्करा कर कहता हैमेरा और तुम्हारा मजहब एक हैये जमीं एक है आसमाँ एक हैसुनो अल्लाह एक हैतुम्हें क्यों नहीं यकींमेरे हाथ की आधी रेखा,तुम्हारे हाथों से मिलेगीतब एक चाँद खिलेगाऔर हमारी ईद होगीना कोई मजहब उसका ना हमारे चाँद की जात होगीकुरान की आयतों सा हर लफ्ज़ उसका फिजा में घुल जाता हैमैं अपनी बंद मुट्ठी खोलकर बनाना चाहती हूँ एक चाँदपर हकीकत की रोशनी में उसका हाथ छुट जाता हैऔर हमारे चाँद का एक अधूरा हिस्सामेरे आँसुओं से भीग जाता है।