ए..वापिस चलो ना...
-सुनील साहिल
छोटी-छोटी बूँदेंयूँ चूमती हैं मेरी देह कोजैसे माँ सहला रही हैमेरे माथे को हौले से..झरनों से पानीखिलखिलाते हुए गिरता हैचट्टानों परजैसे वह लड़कीचपत लगाकर भाग गई होमेरी पीठ परऔर दिखाने लगती हैमुझे अँगूठा जीभ निकालकरऔर ये पेड़हाथ बाँधे खड़ेघूरते हैं मुझेअजीब सी निगाहों सेकि मैं सहम जाता हूँइक मुस्कान को होंठों परचिपकाए हुएबाबूजी की मीठी चपत की छुअनअब भी मेरे गालों परथप्प से सुनाई पड़ती हैये परिंदे मेरी मुँडेर पर बैठगायन-सभा करते हैंकि किसी अलसाई सुबह को बहन नेखैंच ली हो चादर मेरी देह सेऔर कोसने लगती हैं मेरी गुस्साई नजरेंउसकी जल्दी उठने की आदत कोऔर मेरा छोटा सा मनमेरी अँगुली पकड़के कहता है-ए..वापिस चलो ना... !