मंगलवार, 20 जनवरी 2026
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Written By WD

आबोहवा

- संदीप राशिनकर

हिन्दी कविता
ND

पहले
मिलते थे/रुकते थे
अभिवादन करते थे
घंटो बतियाते थे
आबोहवा के
बारे में...
अब
मिलते हैं
पर रुकते नहीं
सोचते हैं
रुकेंगे/ मिलेंगे
क्या बात करेंगे?
पता नहीं इन दिनों
क्या हुआ है
न बची है आब
न बह रही
हवा है!!