अब कभी मत लौटना साथी
काव्य-संसार
फाल्गुनी देर रात जब सितारों की झिलमिलाती बूँदें फिसलती है आसमानी आँगन में और मैं लौट आती हूँ अपने ही मन-मासूम के पास, तब मुस्कुराता-खिलता तुम्हारा गुलाबी चेहरा खूब आता है याद। जब मैं रोती हूँ अपने ही मन के उदास खाली कोने में बैठ अकेली, तब तुम्हारी आँखों के कोमल उजाले में दमक उठती है मेरी रात अँधेरी। अब कभी मत लौटना साथी, मेरे दुश्मन, तुमसे बेहतर है तुम्हारी यादों का सर्द मौसम।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य