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कवि अटल जी की कविता : रोते-रोते रात सो गई

Updated: गुरुवार, 16 अगस्त 2018 (19:24 IST)
रोते-रोते रात सो गई
 
झुकी न अलकें
झपी न पलकें
सुधियों की बारात खो गई।
 
दर्द पुराना,
मीत न जाना,
बातों में ही प्रात: हो गई।
 
घुमड़ी बदली,
बूंद न निकली,
बिछुड़न ऐसी व्यथा बो गई।

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