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वह
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ग्रॅब्रिएला मिस्त्राल उसने मुझे चूमा औरअब मैं कोई और हूँधड़कनों में कोई औरजो मेरी नसों में धड़कता हैऔर वह साँसों में घुल-मिल जातीअब मेरी कोख उतनी ही उदात्तजितना मेरा हृदयऔर फूलों की साँसों में पाई जातीमेरी साँसेंयह सब उसके कारणजो पलता कोख में मेरीजैसे कि घास पर ओस।अनुवाद- नरेंद्र जैन (
पहल की पुस्तिका ‘पृथ्वी का बिंब’ से साभार)