हिन्दी को सरल रहने दीजिए

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पांच छह साल के बच्चे को इस तरह की अशुद्ध हिन्दी में नीरस, उबाऊ कविताएं हम पढ़ाकर राजभाषा का क्या संस्कार डाल रहे हैं? गुलजार की कुछ मुक्त छंद की कविताएं या एकलव्य प्रकाशन की बच्चों की कविताएं भी इन तथाकथित देशप्रेम की भारी भरकम कविताओं से ज्यादा रोचक हैं।

यह कौन-सी हिन्दी हैं

हिन्दी के कुछ दैनिक अखबारों में जो बच्चों का पन्ना होता है, उसमें कई बार बारह से 15 साल के बच्चों की लिखी हुई इतनी सुंदर कविताएं होती हैं जो झट जबान पर चढ़ जाती हैं लेकिन नहीं, पता नहीं कैसी-कैसी जुगत भिड़ाकर ये पंडिताऊ प्राध्यापक पाठयक्रम में अपनी गोटियां बिठा लेते हैं फिर भले ही बच्चे ऐसी कविताएं पढ़कर हिन्दी पढ़ना छोड़ दें या अपने माता पिता से पूछें कि यह कौन-सी हिन्दी हैं।

सुधा अरोड़ा|
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