ग़ालिब का ख़त-26
|
मेरे एक दोस्त हैं। उन्होंने एक रुपया मुझक दिया है और यह चाहा कि मैं वह रुपया आपके पास भेजूँ और आप अपने भाई साहिब के पास हाथरस भेज दें, और वह एक रुपए के चाकू, जैसे कि वहाँ बनते हैं, बहुत ताकीद कराकर और फ़रमाइशी तोहफ़ा बनवाकर आपको भेज दें। मैं हैरान था कि रुपया आप तक क्योंकर पहुँचे। बारे मिर्जा़ साहिब आज आ गए और उन्होंने कहा कि मैं कल कोल जाऊँगा।
मैंने यह ख़त लिखकर मय रुपए के उनको दे दिया। मेहरबानी फ़रमाकर हाथरस भेजिए और ताकीद लिखिए कि बहुत अच्छे चाकू जितने आवें, मगर ऐसे कि उनसे बेहतर न हों, बनवाकर भेज दें, जल्द। वस्सलाम।
| |
हक़ तआ़ला, तुमको ख़ुश व ख़ुरम-ओ-तंदुरुस्त, तुम्हारी औलाद के सर परा सलामत रखे और तुम उनका बुढ़ापा देखो और उनके बच्चों को खिलाओ। मुंशी हरगोविंद सिंह आए और उनके बच्चों को खिलाओ। मुंशी हरगोविंद सिंह आए और बेगम का मुझे पयाम दिया कि चच्चा मैंने कान छिदवा लिए हैं। सो तुम मेरी तरफ़ से उसको दुआ कहना और कहना कि तुमको मुबारक हो और तुमक ज़मुर्रुद और याकूत के पत्ते, बालियाँ पहननी नसीब हों।
जुलाई 1851 ई.
