सहकारिता रच सकता है नया इतिहास बशर्ते...

उमेश चतुर्वेदी|
महंगाई की मार लोगों को लगातार परेशान कर रही है...जब तक देश की राजनीति कल्याणकारी राष्ट्र में समाजवादी दर्शन के इर्दगिर्द घूमती रही, तब तक दिखावे के लिए ही सही चुनावों के दौरान भारतीय राजनीतिक तंत्र लोगों को राहत दिलाने की कोशिश जरूर करता था, लेकिन जैसे-जैसे मनमोहनी अर्थव्यवस्था ने नवउदारीकरण में गोते लगाने तेज किए, वैसे-वैसे राष्ट्र का कल्याणकारी चेहरा निस्तेज पड़ता गया और ऐसे में गांधी और लोहिया के दरिद्रनारायण की तरफ सही मायने में देखने की भला किसे जरूरत पड़ने लगी। रही-सही कसर टीआरपी आधारित नवमीडिया क्रांति ने पूरी कर दी।


दुर्भाग्यवश आज टीआरपी केंद्रित सरोकारहीन खबरों के टेलीविजन चलन के साथ अखबार भी कदमताल करने लगे हैं। अखबारों में आ रहे इस बदलाव को देखकर हैरत इसलिए होती है, क्योंकि उनके पास कम से कम 200 साल का इतिहास है। इसके साथ ही स्वाधीनता आंदोलन की ठोस पूंजी भी उनके जीन में है। ऐसे में अगर सरोकारी खबरों से उनका विचलन होने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। बहरहाल ऐसे माहौल में अगर सहकारी संघों का राष्ट्रीय सम्मेलन सप्ताह भर तक चले और वह कथित मुख्यधारा की मीडिया से अनदेखा रह जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
देश में सहकारिता का इतिहास एक सौ दस साल पुराना है। गुजरात से शुरू इस आंदोलन ने एक दौर में पूरे देश में अपना पैर पसार लिया था। वैसे अमूल दूध और लिज्जत पापड़ सहकारिता के स्वर्णिम और गौरवपूर्ण विरासत के अंग हैं। देश के सहकारी संघों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस सम्मेलन के मौके पर कहा कि बढ़ती महंगाई को रोकने में सहकारिता सक्षम है। उन्होंने अपनी कार्ययोजना भी पेश की, लेकिन उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। दरअसल अब भारत के सहकारी आंदोलन को भी तोड़ने और खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
बेशक उत्तर भारत के कुछ राज्यों मसलन उत्तरप्रदेश और बिहार में सहकारिता राजनीति के लिए लूट का एक बड़ा जरिया रहा, लेकिन यह भी सच है कि बहुराष्ट्रीयकरण के इस दौर में आज भी किसानों को सस्ती दरों पर खाद और बीज के साथ ही सस्ती दरों पर कर्ज मुहैया कराने का साधन बना हुआ है, लेकिन इसके बावजूद देश में अब भी करीब 94 हजार ग्रामीण या तीसरे स्तर की प्राथमिक समितियां कार्यरत हैं और छोटे किसानों के लिए मददगार बनी हुई हैं।
लेकिन सहकारी और ग्रामीण बैंकों पर नजर रखने और ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी के प्रसार के लिए गठित नाबार्ड को ये समितियां ही बोझ नजर आने लगी हैं। नाबार्ड की ओर से इन समितियों को भंग करने की सिफारिश की गई है। सितंबर में इसे लेकर देशभर के सहकारी संगठनों ने अपनी चिंता जताई थी और कहना न होगा कि पिछले दिनों चले सहकारिता सप्ताह में भी इसे लेकर चर्चा हुई।
सहकारी संघों के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रपाल यादव ने इस बार भी नाबार्ड के उस फैसले को पीड़ाप्रद करार दिया, जिसमें अध्यादेश के जरिए पैक्स की संपदा को जिला सहकारी बैंक में जमा कराने और पैक्स सदस्यों को कमीशन एजेंट बनाने का निर्देश जारी किया है।

उनके मुताबिक इससे सहकारिता की आधारभूत संरचना के ध्वस्त होने का खतरा तो है ही, इससे सहकारिता आंदोलन का बड़ा नुकसान होगा। जो सहकारिता पर यह हमला प्रजातांत्रिक स्वरूप की हत्या जैसी है। बहरहाल सहकारी संघों को शक है कि यह सब अमेरिकी माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों को नया बाजार मुहैया कराने के लिए किया जा रहा है, लेकिन इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
देश को यह पता है कि अमूल की सफलता को आधार बनाकर बिहार में सुधा, राजस्थान में सरस, हरियाणा में वेरका, पंजाब में बीटास, उत्तरप्रदेश में पराग और मध्यप्रदेश में सांची के साथ ही विजया जैसे पच्चीस राज्य दुग्ध उत्पादन एवं वितरण संघ लोकसेवा में लगे हैं। सहकारी सप्ताह में चर्चा इस बात की भी हुई कि दूध मॉडल की तर्ज पर सहकारिता के तहत अनाज, दलहन, सब्जी व प्याज उत्पादन एवं वितरण के क्षेत्र में नए सिरे से क्रांति पैदा की जा सकती है।
सहकारिता से कृषि आधारित लघु उद्योगों के जरिए दलिया, चना पैकेजिंग आदि की दिशा में बेहतर काम किया जा सकता है। इससे उत्पादक किसान और वितरकों का समान रूप से भला हो सकता है। साथ ही मिलावट करने वाले, बिचौलियों और जमाखोरों से मुक्ति मिल सकती है। पूरे देश में एक समान मूल्य पर हर मौसम में खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है और मल्टीनेशनल के व्यावसायिक हित से लोहा लिया जा सकता है।
सहकारी संघों की यह मांग बढ़ती महंगाई के दौर में बेहद मौजूं है...सहकारी संघों को अगर यह जिम्मेदारी दी गई और सहयोग किया गया तो निश्चित तौर पर वे महंगाई का मुकाबला करने में जनता की मदद कर सकेंगे, लेकिन सबसे बड़ी बाधा यह है कि इसके लिए हमारा समाज तैयार नहीं दिख रहा है। रही बात राजनीति की तो उसे शायद यह दकियानूसी विचार लगे। (लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं)



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