हाल ही में आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले महज सात साल में दोगुनी हो गई है। इससे पहले एक खबर यह भी आई थी कि विकास दर के मामले में भारत ने अब चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। मगर सवाल है कि अर्थव्यवस्था के आकार में हुई बढ़ोतरी और ऊंची विकास दर के बरक्स देश के आम लोग किस तरह की जिंदगी जी रहे हैं?
इस सवाल का चुभने वाला जवाब देते हैं सामाजिक-आर्थिक जनगणना के निष्कर्ष। ये निष्कर्ष ग्रामीण भारत की असलियत दिखाकर सिर्फ चौंकाते ही नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण विकास के लिए अपनाई गई अब तक की सरकारी नीतियों पर सवाल भी उठाते हैं और बताते हैं कि देश की आबादी का बड़ा बोझ उठा रहे हमारे गांव किस गंभीर संकट से गुजर रहे हैं।
पिछले डेढ़ दशक से जारी किसानों की आत्महत्या का सिलसिला तो गांवों की दारुण कथा बयान करता ही है, जनगणना के आंकड़े संकट के और भी डरावने आयामों को रेखांकित करते हैं। शहरी इलाकों के आंकड़े अभी जारी नहीं किए गए है। लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके जारी होने पर भी देश की कुल तस्वीर लगभग ऐसी ही उभरेगी।
सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश के कुल 24.39 करोड़ घरों में से 17.91 करोड़ ग्रामीण घर हैं। यानी शहरीकरण की तेज रफ्तार के बावजूद अभी भी देश की लगभग तीन चौथाई आबादी अभी भी गांव-कस्बों में ही रहती है। इसमें भी करीब आधी आबादी, यानी 48.52 फीसदी घर किसी न किसी तरह के अभाव से जूझ रहे हैं।
गांवों में हर तीसरा परिवार भूमिहीन है और जीवन यापन के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर है। 2.37 करोड़ परिवार एक कमरे के कच्चे घरों में रहते हैं, वहीं 51.14 फीसदी परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। खेती पर निर्भर परिवारों की तादाद 30.10 फीसदी है। 14.01 प्रतिशत परिवार अन्य स्रोतों पर निर्भर है। इसके अलावा चार फीसदी से भी ज्यादा परिवार कचरा बीनने, भीख मांगने और दान पर निर्भर है।
वर्ष 2011 से 2013 के बीच हुई इस जनगणना में पहली बार जाति के पहलू को भी शामिल किया गया था। संसद में हुई काफी जद्दोजहद के बाद पिछली सरकार इसके लिए राजी हुई थी। लेकिन अब गणना हो जाने के बाद जाति के आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं। अगर किए जाएं तो गरीबी का यथार्थ और भी खुलकर सामने आएगा।
यह एक हकीकत है कि निचली और पिछड़ी कही जाने वाली जातियों में गरीबों की तादाद ज्यादा है। इसीलिए जाति संबंधी आंकड़ों को लेकर शायद सरकार को यह भय सता रहा होगा कि इनको जारी करने से कहीं गरीबी के सामाजिक आयाम को लेकर नए राजनीतिक मुद्दे न खड़े हो जाएं। लेकिन जिस तरह तीन चौथाई परिवारों के पांच हजार रुपए और 92 फीसदी परिवारों के दस हजार रुपए प्रतिमाह से कम पर गुजारा करने के तथ्य सामने आए हैं, उससे समझा जा सकता है कि अगड़ी मानी जाने वाली जातियों के भी बहुत से परिवार तंगहाल जीवन जी रहे होंगे।
वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही देश में गांवों, गरीबों और किसानों की स्थिति सुधारने की बातें की जाती रही हैं। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सबकी बेहतरी के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की थी। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था और करीब ढाई दशक पहले अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले करने की शुरुआत के पीछे यह भरोसा था कि उदारीकरण की लहर ग्रामीण भारत में बदलाव लाएगी। तमाम कार्यक्रमों, दावों और आदर्श वचनों के बावजूद हमारे गांवों की हालत दिनोदिन खराब ही होती जा रही है। कंगाली और बदहाली के महासागर में संपन्नता के कुछ टापुओं को छोड़ दें तो बाकी सारे गांवों और यहां तक कि शहरों में भी जीने के लिए आवश्यक बुनियादी चीजें भी नहीं हैं।
हाल ही में मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने अपनी इंडिया रिपोर्ट में भी कहा है कि अर्थव्यवस्था में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी निराशाजनक है। इसके अनुसार देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष 2015-16 में कमजोर बनी रहेगी, जो भारत सरकार व देश के बैंकों की वित्तीय साख के प्रतिकूल है। अमेरिका की वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट भी कहती है कि भारत में गांवों का समुचित विकास न होने का एक प्रमुख कारण कृषि पर निर्भर आबादी मे तेजी से वृद्धि होना है।
साल 1980 से 2011 के बीच भारत की कृषक आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में कृषि आधारित आबादी सबसे ज्यादा भारत में ही बढ़ी है। कृषि पर निर्भर आबादी बढ़ने से इस क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ने की बजाय घट रही है। इतना ही नहीं, गांवों में रोजगार के वैकल्पिक अवसर भी कम हैं। यही कारण है कि इस समय देश की 60 प्रतिशत आबादी रोजगार के लिए खेती-किसानी से जुड़ी हुई है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी कम होती जा रही है।
आजादी के बाद के वर्षो में, खासकर बाजारवादी अर्थव्यवस्था शुरू होने के बाद, शहरों की तो चांदी हो गई लेकिन इसकी कीमत देश की आत्मा कहे जाने वाले गांवों को ही चुकानी पड़ी, क्योंकि सरकारों ने आवासीय अट्टालिकाएं खड़ी करने लिए बिल्डरों और बड़े कल-कारखाने लगाने लिए उद्योगपतियों को उपकृत करने के मकसद से किसानों की जमीनों का अधिग्रहण शुरू कर दिया। इससे खेती की जमीन छीजती गई और गांव के छोटे-मोटे उद्योग-धंधे चौपट हो गए। शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यवसाय जैसी तमाम बुनियादी सुविधाओं का रुख शहरों की ओर मुड़ गया। इन बुनियादी सुविधाओं से गांव महरूम बने रहे। गांवों के सामाजिक जीवन को खाप पंचायतों या ऐसी ही दूसरी पंरपरागत संस्थाओं के भरोसे छोड़ दिया गया। बदहाली और मजबूरी के इसी माहौल के चलते गांवों से लोगों के पलायन का दौर शुरू हो गया जो आज भी चिंताजनक रूप से जारी है।
महात्मा गांधी की नजर में गांव गणतंत्र के लघु रूप थे, जिनकी बुनियाद पर आजाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होनी थी। महात्मा गांधी को गांवों में 'लघु गणतंत्र' की छवि दिखी थी, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था की इकाई होने के साथ इनमें प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था में आत्मनिर्भरता वाला तेज हुआ करता था। गांधी ने अपने इस सपने को ग्राम स्वराज्य के स्र्प में परिभाषित किया था। लेकिन गांधी की वैचारिक विरासत के दावेदारों यानी आजाद भारत के शासकों ने विकास का जो मॉडल अपनाया था उससे आजादी के साढ़े छह दशकों में गांवों की हालत लगातार बद से बदतर होती गई। सामाजिक-आर्थिक जनगणना के ताजा आंकड़े इसी हकीकत को बयान कर रहे हैं।
दरअसल, हमारी सरकारों की प्राथमिकता में गांव शुरू से ही दोयम स्थान पर रहे हैं और मौजूदा सरकार भी स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरों को ही सजाने संवारने की बात कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि स्मार्ट सिटी बनाने के लिए तो गांवों की जरूरत होगी, पर गांवों की दशा सुधारने के लिए शहरों का योगदान कहीं नहीं होगा।
कहा जा सकता है कि विकास की मौजूदा अवधारणा में स्मार्ट गांव की कल्पना की कोई जगह नहीं है। अलबत्ता 'सांसद आदर्श ग्राम योजना' जैसी प्रतीकात्मक पहल के जरिए यह संदेश देने की कोशिश जरूर की गई है कि सरकार गांवों को लेकर भी चिंतित है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या समूचे ग्रामीण भारत के विकास के तकाजे को कुछ चुनिंदा गांवों को चमका कर पूरा किया जा सकता है? दरअसल गांवों को एक हद तक आत्मनिर्भर बनाकर, गांव के लोगों के लिए रोजी-रोजगार के साधन मुहैया कराकर ही गांवों का विकास संभव है। ऐसी व्यवस्था के बगैर गांवों की तस्वीर में कभी कोई मुकम्मल बदलाव नहीं हो सकता। जो भी बदलाव होगा, उसके भी टिकाऊ होने की कल्पना नहीं की जा सकती।