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सितारे तो थे पर टीम नहीं बनी

भारत पाकिस्तान वनडे सिरीज
भानुप्रताप सिं
भारत की पाकिस्तान पर 3-2 की जीत सिर्फ यह बताती है कि धोनी की कप्तानी में टीम पहली बार कोई वनडे श्रृंखला जीती या इतिहास को खंगालें तो अपनी जमीन पर भारत 24 साल बाद पाकिस्तान से श्रृंखला जीतने में सफल रहा। पर लाख टके का सवाल यह है कि क्या आपको उनकी हार और अपनी जीत में मजा आया अर्थात क्रिकेटप्रेमी के लिहाज से क्या आप इस श्रृंखला का लुत्फ उठा सके?

हमने दोनों मुल्कों के बीच काफी क्रिकेट देखा है, सरहद के उस पार भी और इस पार भी, जो मैच पहले जंग समझे जाते थे, वही आज दोस्ती के आलम में डूबे हैं। कोई भी हार जाए, कहीं भी ना संभलने वाली स्थिति नहीं बनती। यह दोनों मुल्कों के बीच सुधरते रिश्तों की ध्वनि है।

यह भी कि, दोनों मुल्कों की अवाम सिर्फ दो ही चीजों से जुड़ती है- एक क्रिकेट और दूसरा फिल्मी गीत या गजलें। यही वजह है कि क्रिकेट आज पूरी शांति से खेला जा रहा है, इंशा अल्लाह यह सिलसिला आगे भी जारी रहे।

दूसरी बात जिसका ताल्लुक क्रिकेट से है वो दिल दुखा देती है, सिर्फ इसलिए कि मेहमान अपनी ताकत के साथ न्याय नहीं कर पाए। यदि कर पाते तो जयपुर मैच इतना नीरस नहीं होता। भले ही पाकिस्तान जयपुर में जीता पर मामला तो ग्वालियर में ही निपट चुका था।

गुवाहाटी में भी टीम ने ऐसा ही किया, मोहाली की बात छोड़ दें तो कानपुर में टीम फिर पटकनी खा गई, ग्वालियर में चारों खाने चित हुई टीम ने जयपुर मैच को औपचारिक बना दिया।

क्यों हुआ ऐसा जब मेहमान टीम में यूसुफ, युनूस, शोएब अख्तर और उमर गुल मौजूद थे, क्यों हुआ ऐसा जबकि उनके पास अफरीदी, अकमल, नजीर, बट्ट, मिस्बाह व शोएब मलिक की मौजूदगी थी। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि टीम में सितारों की चमक तो थी, किंतु गर्दिश के वक्त वे एक कतार में नहीं थे।

संभवतः उन्हें कोच जेफ लॉसन ने यह बताया नहीं होगा कि क्रिकेट एक टीम गेम है। व्यक्तिगत प्रदर्शन खिलाड़ी की जगह अगले मैच में तो पक्की कर सकता है पर टीम को जिता सके इस बारे में शक बना रहता है। यदि पाक टीम एक यूनिट की तरह क्लिक कर जाती तो श्रृंखला का फैसला ग्वालियर की बजाय जयपुर में होता।

शायद ही किसी को याद हो कि धोनी ने ट्वेंटी-20 विश्व कप के पहले, उसके दौरान, उसके बाद और फिर इस श्रृंखला के दौरान और बाद में भी कहा था कि मैं किसी एक खिलाड़ी की बजाय पूरी टीम के सहयोग पर ज्यादा भरोसा करता हूँ। मैं नहीं चाहता कि जीत का सेहरा किसी एक के माथे बँधे, हम टीम हैं, हमें टीम के रूप में ही खेलना चाहिए।

धोनी के शब्द इस श्रृंखला के निचोड़ के रूप में हैं। द्रविड़ को पहले ही टीम से बाहर कर दिया गया था (अब वे शायद ही आपको वनडे में नजर आएँ) इसका दबाव सौरव और उनसे कहीं ज्यादा सचिन पर पड़ा, जिन्होंने सौ चूकने के बावजूद यह तय कर दिया कि टीम ही जीतेगी। सचिन के इसी भाव ने टीम में जीत की आग भर दी।

अब तो सभी को आग उगलना ही था, सहवाग जैसे टीम में लौटने वाले को भी और जीत यज्ञ में सभी का योगदान मिला। धोनी भले ही आपको मार्केटिंग वेल्यू वाले क्रिकेटर लगते हों पर वास्तव में झारखंड का यह पुत्र है क्रिकेट का जानकार।

यहीं पाकिस्तान से चूक हो गई और वह प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से भरी एक असंगठित टीम बनकर रह गई, जबकि उसके पास लॉसन जैसा सक्षम कोच था जबकि भारतीय टीम लालचंद राजपूत- कोई बताए कि ये आदमी कौन है, क्या इसने किया- के सहारे काम कर रही है।

दरअसल धोनी ने टीम में ऐसा दम भरकर रखा है कि कोई भी खिलाड़ी कभी भी दम भरकर, खम ठोंककर खड़ा हो सकता है और कह सकता है क्या हुकूम बजा लाऊँ कप्तान साहब। शोएब मलिक में वह बात नहीं है। भले ही उनके पास मजबूरी में टीम में लिए गए शोएब अख्तर थे (आसिफ का नकली चोट का बहाना, न आना)।

बावजूद तमाम विवादों के शोएब ने अपना काम बखूबी अंजाम दिया। अब उन्हें दूसरे छोर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला तो वे करें क्या? स्वयं कप्तान और अफरीदी बतौर स्पिनर नाकाम रहे। किस्सा कोताह कि मेहमान टीम बिखरी हुई थी। टीम रूप में थी ही नहीं।

उधर मेजबान टीम तमाम सितारों के होने के बावजूद एक टीम के रूप में खेलने पर उतारू थे, उतरे भी, खेले भी, जीते भी अब मर्जी आपकी जो फैसला ले लीजिए। तमाम सितारे तो हों टीम में पर टीम वाली बात न हो उसका क्या हश्र होता है वह आप शोएब मलिक से पूछ सकते हैं।