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राहुल द्रविड़ का कमजोर बहाना

इंग्लैंड राहुल द्रविड़
-शराफत खा
टीम इंडिया ने ओवल टेस्ट ड्रॉ करवाकर इंग्लैंड को उसकी धरती पर 21 साल बाद किसी टेस्ट श्रृंखला में हराया। यकीनन यह एक उपलब्धि है और इसके लिए राहुल द्रविड़ और उनके साथी बधाई के हकदार हैं।

लेकिन यह उपलब्धि और भी गौरवपूर्ण हो सकती थी, अगर कुछ फैसले समय पर लिए जाते तो भारत यह श्रृंखला 1-0 के बजाए 2-0 से जीतता। अंत भला तो सब भला की तर्ज पर क्रिकेट प्रेमी भारत के श्रृंखला पर कब्जा करने पर खुशी मना रहे हैं।

भारत ने पहली पारी में 664 रनों का विशाल स्कोर बनाया, जो किसी भी सूरत में कम नहीं था। भारत की पकड़ टेस्ट पर और भी मजबूत हो गई जब इंग्लैंड की पहली पारी 345 पर सिमट गई। इस मोड़ पर द्रविड़ से चूक हो गई। उन्होंने इंग्लैंड को फॉलोऑन के लिए नहीं कहा।

इस फैसले को समझने के लिए कुछ बुनिवादी बातों को समझना जरूरी है। द्रविड़ ने इंग्लैंड को आखिर फॉलोऑन के लिए क्यों नहीं कहा इसके कुछ कारण हो सकते हैं।

एक कारण यह हो सकता है, जो द्रविड़ ने मैच के बाद दिया। द्रविड़ ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि हमारे गेंदबाज थके हुए थे। मैं उन्हें आराम देना चाहता था ताकि वे तरोताजा हो सकें, इसलिए मैंने इंग्लैंड को फॉलोऑन के लिए नहीं कहा।

द्रविड़ का यह बयान खोखला और आधारहीन लगता है। इसकी तह में जाने के लिए टेस्ट मैच के तथ्यों को खंगालना जरूरी है। ओवल टेस्ट के तीसरे दिन का खेल खत्म होने तक इंग्लैंड ने 96 ओवर की बल्लेबाजी के दौरान 321 रनों पर 9 विकेट खो दिए थे। इन 96 ओवर में 88 ओवर की गेंदबाजी भारतीय गेंदबाजों ने तीसरे दिन की, इसके बाद गेंदबाजों को 16 घंटे का आराम मिला।

वे चौथे दिन फिर मैदान पर उतरे और महज 43 गेंदों में (7.1 ओवर) में ही इंग्लैंड की पहली पारी 345 रनों पर समेट दी। इन 7.1 ओवरों में 4 ओवर आरपी सिंह और 3.1 ओवर कुंबले ने गेंदबाजी की। याने आरपी सिंह और कुंबले 3 और 4 ओवर गेंदबाजी करने के बाद और जहीर खान, श्रीसंत बिना कोई गेंद फेंके थक गए।

भारत इस वक्त भी इंग्लैंड से 319 रन आगे था। इसके बाद द्रविड़ ने इंग्लैंड को फॉलोऑन यह कह कर नहीं दिया कि गेंदबाज थके हुए हैं। सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के गेंदबाज केवल 7 ओवर की गेंदबाजी में थक गए? क्या 16 घंटे का आराम उनके लिए पर्याप्त नहीं था? क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न जीतने के लिए थकावट को बहाना बनाना खेल के साथ न्याय है?

इंग्लैंड को फॉलोऑन नहीं देने के पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि द्रविड़ को शायद लग रहा होगा कि 319 रनों के अंदर इंग्लैंड की दूसरी पारी नहीं समेटी जा सकती, इसलिए बल्लेबाजी करके इंग्लैंड को लक्ष्य देना मुफीद होगा। भारतीय कप्तान शायद चौथी पारी में बल्लेबाजी करने में भी झिझक रहे थे। उन्हें डर था कि पहली पारी में इंग्लैंड की गेंदबाजी की धज्जियाँ उड़ाने वाले भारतीय बल्लेबाज दूसरी पारी में जीत के लिए जरूरी 80-100 रन भी नहीं बना पाएँगे।

चलिए यहाँ तक भी द्रविड़ के फैसले को मान लेते हैं, लेकिन जिस तरह से दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाजों ने और खुद द्रविड़ ने (96 गेंदों में 12 रन) बल्लेबाजी की, वहीं से भारत ने इस टेस्ट को जीतने का मौका गँवा दिया।

होना तो यह चाहिए था कि चाहे भारत ने इंग्लैंड को फॉलोऑन के लिए नहीं कहा, लेकिन दूसरी पारी में 20-25 ओवरों में 100-120 रन जोड़कर इंग्लैंड को 420-440 रनों का लक्ष्य दिया जाता। टेस्ट क्रिकेट के 130 साल के इतिहास (15 मार्च, 1877 इंग्लैंड- ऑस्ट्रेलिया, मेलबोर्न टेस्ट से अब तक) में ऐसा केवल तीन बार हुआ है कि किसी टीम ने चौथी पारी में 400 या उससे ज्यादा रन बनाकर जीत दर्ज की हो।

इस टेस्ट में भारतीय गेंदबाजों के प्रदर्शन और इंग्लैंड बल्लेबाजी की दशा देखकर चौथी पारी में 400 रन बनने की संभावना और भी क्षीण हो जाती है। ऐसे में द्रविड़ का डरकर सिर्फ रिकॉर्ड बनाने के लिए जीता हुआ टेस्ट ड्रॉ करवाना खेल भावना के खिलाफ है।

भारत ने अपनी दूसरी पारी में 58 ओवर तक बल्लेबाजी की और केवल 180 रन जुटाए। इससे नुकसान यह हुआ कि इंग्लैंड को दूसरी पारी में आउट करने के लिए भारतीय गेंदबाजों को 110 ओवर ही मिले, जो इस तरह के विकेट पर कम थे। अगर भारत अपनी दूसरी पारी 20-25 ओवर खेलकर ही घोषित करता तो उसके गेंदबाजों को इंग्लैंड को आउट करने के लिए कमसे कम 138 ओवर मिलते। अगर भारतीय गेंदबाजों ने इंग्लैंड की दूसरी पारी में 110 ओवर में 6 विकेट निकाल लिए थे तो इस बात की पूरी संभावना थी कि वे 138 ओवर तक पूरे 10 विकेट ले सकें। द्रविड़ यह निर्णय लेने में भी असफल रहे।

कोई भी कप्तान दो तरह की भावनाओं के साथ मैदान पर उतरता है, पहला जीतने के लिए और दूसरा न हारने के लिए। हालाँकि दोनों के परिणामों में बहुत अंतर है, ओवल टेस्ट में द्रविड़ के अंदर भावना नंबर दो काम कर रही थी।

इंग्लैंड में ऐतिहासिक टेस्ट श्रृंखला जीतने का जश्‍न मनाया जाए, लेकिन ध्यान इस बात पर भी दिया जाए कि भारतीय कप्तान खेल के बुनियादी उसूलों से सिर्फ इसलिए भटक गए कि उन्हें अपना नाम अज‍ीत वाडेकर (1971), कपिल देव (1986) के साथ उन भारतीय कप्तानों की फेहरिस्त में जोड़ना था, जिन्होंने इंग्लैंड में जाकर टेस्ट श्रृंखला जीती हो।