अभद्रता और पक्षपात के खिलाड़ी
- जेश पांडेय
भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे में उठे विवादों के तूफान ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के ढाँचे को एक बार फिर झकझोर दिया है। इस दौरे से उपजी कड़वाहट दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकती है। सिडनी टेस्ट में अंपायरों के गलत फैसलों से आहत भारतीय टीम के घाव हरभजनसिंह पर तीन टेस्ट मैचों की पाबंदी लगने के बाद और हरे हो गए हैं। शायद ही किसी टीम को खेल के मैदान में ऐसे पक्षपात और अन्याय का शिकार होना पड़ा है।
सिडनी में जो कुछ हुआ है, उससे भद्रजनों (जेंटलमैंस गेम) के खेल को नियंत्रित करते वाले प्रशासकों को सबक सिखाना चाहिए। अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कॉन्फ्रेंस (आईसीसी) ने अंपायरिंग के स्तर में सुधार और खिलाड़ियों को अनुशासित करने के वास्ते सख्त कदम नहीं उठाए तो इस खेल में अभद्रता की तमाम सीमाएँ टूट जाएँगी।
सिडनी टेस्ट में वेस्टइंडियन अंपायर स्टीव बकनर और अँगरेज मार्क बेंसन ने इस कदर गलतियाँ की हैं कि नौसिखियों को भी शर्म आ जाए। अंपायर भी मनुष्य हैं। उनसे गलतियाँ हो सकती हैं। आए दिन क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस और अन्य खेलों में अंपायरों की भूल-चूक मीडिया की सुर्खियों में जगह पाती है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला में सिडनी टेस्ट कोई पहला मैच नहीं है, जहाँ अंपायरों की भूलों के कारण किसी टीम को मैच गँवाना पड़ा है। ऐसे कई मैच हो चुके हैं, लेकिन सिडनी में ज्यादातर फैसले भारत के खिलाफ गए हैं। अंपायरों ने स्कूली बच्चों को मात करने वाला बर्ताव किया है। जो फैसले तीसरे अंपायर को सौंपे जा सकते थे, उन्हें क्या सोचकर खुद निपटाया गया। इससे अंपायरों की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है।
अंपायरों को पूरी तरह पाक-साफ मान लिया जाए और मानवीय भूल के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तब भी कुछ सवालों के जवाब खोजने की जरूरत है। ये सवाल हरभजनसिंह पर लगाई गई पाबंदी के मामले में भी उठते हैं। मसलन, माइकल क्लार्क द्वारा गांगुली के कैच का मामला देखिए। मार्क बेंसन ने फील्डिंग करने वाली टीम के कप्तान रिकी पोंटिग से पूछा कि कैच लिया गया है अथवा नहीं।
अब रिकी पोंटिंग महाराजा युधिष्ठिर और राजा हरिश्चन्द्र जैसे सत्यवादी तो हैं नहीं कि कह देते, माइकल क्लार्क ने जमीन से कैच उठाया है। बेंसन ने स्क्वायर लेग पर खड़े अपने साथी अंपायर बकनर से भी पूछने की जरूरत नहीं समझी थी। वे तीसरे अंपायर को मामला सौंपकर झंझट से बच सकते थे। फिर भी, बेंसन ने विवादास्पद तरीका अख्तियार किया। भारत टेस्ट बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था।
गांगुली से पहले द्रविड़ को बकनर ने गलत आउट दिया था। द्रविड़ के फैसले की हलचल स्टेडियम में महसूस की जा सकती थी। इतना सब होते हुए बेंसन ने सही रास्ता क्यों नहीं अपनाया था। जाहिर है, वे ऑस्ट्रेलिया की राह आसान बना रहे थे।
स्टीव बकनर ने भारत के खिलाफ जैसे फैसले दिए हैं, उसे देखते हुए उन्हें अंपायरों के अंतरराष्ट्रीय एलीट पैनल से फौरन विदा कर देना चाहिए। इस पैनल में काफी ठोक-बजाकर क्रिकेट खेलने वाले देशों के श्रेष्ठ अंपायरों को शामिल किया जाता है। आश्चर्य है, दुनिया की क्रिकेट को चलाने वाले एलीट पैनल में एक भी भारतीय नहीं है। पैनल के अंपायरों को आला दर्जे की सुविधाएँ मिलती हैं। उन्हें मैदान में प्रति घंटा 440 डॉलर की दर से मेहनताना मिलता है। उनका हर साल मेडिकल चेकअप होता है।
कुछ साल पहले तक बकनर उच्च स्तर के अंपायर थे। सभी खिलाड़ी उनकी पेशेवर क्षमता का सम्मान करते थे। हालाँकि भारत के सिलसिले में उनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। 2004-05 के ऑस्ट्रेलियाई दौरे में भारतीय कप्तान गांगुली ने अपनी रिपोर्ट में बकनर के खिलाफ तीखी टिप्पणियाँ की थीं। बकनर शारीरिक और मानसिक रूप से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव को झेलने में सक्षम दिखाई नहीं देते हैं।
क्रिकेट में अपार पैसा है। खासतौर से भारत में इस खेल में अरबों रुपए दाँव पर लगे हैं। इससे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है। लिहाजा, खेल को चलाने के सभी पहलुओं में उच्च कोटि के पेशेवर कौशल को ध्यान में रखने की जरूरत है। आईसीसी को अंपायरिंग का स्तर सुधारने के लिए विशेष प्रयास करना होंगे। अंपायरों के लिए आयु सीमा निश्चित की जाए। उनके प्रदर्शन की हर सीरिज के बाद बारीकी से समीक्षा होना चाहिए।
निम्न स्तरीय अंपायरिंग के कारण टेस्ट गँवाने के बाद भारतीय टीम को हरभजनसिंह पर लगे तीन टेस्ट मैचों के प्रतिबंध ने जोरदार आघात पहुँचाया है। मैदान के बाहर भी भारत के साथ अन्याय हुआ है। हरभजन पर ऑस्ट्रेलियाई एंड्रयू साइमंड्स पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप है। पता लगा है, हरभजन ने साइमंड्स को बिग मंकी (बड़ा बंदर- मलूका) कहा है।
मैच रैफरी माइक प्राक्टर ने ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की गवाही के आधार पर हरभजन को सजा दी है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अकेले तथाकथित रूप से प्रभावित पक्ष की गवाही को सही कैसे माना जा सकता है। अंपायरों के समान मैच रैफरी भी ऑस्ट्रेलिया के प्रभाव में लगते हैं।
आमतौर पर चैंपियन टीमों और उस्ताद खिलाड़ियों के खिलाफ फैसले देने में कई अंपायर और रैफरी हिचकिचाते हैं। हम यहाँ बेईमानी और पक्षपात के तत्व को अलग रखकर विचार करते हैं। पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर बताते हैं, उनकी राष्ट्रीय चैंपियन टीम बंबई को कई बार अपनी प्रतिष्ठा और ऊँचे कद के कारण अनजाने में अंपायरों का समर्थन मिल जाता था। ऑस्ट्रेलिया विश्व चैंपियन है। संभव है, कमजोर अंपायर चैंपियन टीम के आभामंडल की चकाचौंध में गलत फैसले देते हैं। आईसीसी ऐसे अंपायरों पर डंडा क्यों नहीं चलाता है।
सिडनी टेस्ट का घटनाक्रम यह भी बताता है कि हरभजन को क्यों निशाना बनाया गया है। मैदान में गाली-गलौज करने और बदसलूकी के मामले में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का कोई मुकाबला नहीं है। उनके क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल व अन्य खेलों के खिलाड़ी गाली बकने (स्लेजिंग), डराने-धमकाने की कला में पारंगत हैं।
इसे ऑस्ट्रेलियाई संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा माना जाता है। जैसा कि पूर्व कप्तान स्टीव वॉ कहते हैं, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने वाली टीमें यह नहीं समझती हैं कि स्लेजिंग या उसे जो कुछ भी नाम दें- करते हुए ऑस्ट्रेलियाई बच्चे बड़े होते हैं। वे स्कूल के मैदान और घर के पिछवाड़े में इसी तरह खेलते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में यह भी कहावत है, मैदान की बातचीत को मैदान में ही छोड़ दिया जाना चाहिए। फिर रिकी पोंटिंग ने हरभजन के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी की शिकायत क्यों की है। मतलब साफ है, वे इस तरह के हथकंडे अपनाकर तगड़ी चुनौती दे रही भारतीय टीम के इरादों को तोड़ना चाहते हैं।
दरअसल, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बरसों से जो करते रहे हैं, अब उन्हें उसका जवाब मिलने लगा है। पोंटिंग की टीम टेस्ट मैचों में लगातार 16वीं जीत हासिल करना चाहती थी। इसलिए उसने सिडनी में खेल भावना को ताक पर रख दिया। अंपायर बेंसन और रैफरी माइक प्रोक्टर के एकतरफा फैसले ऑस्ट्रेलिया के प्रति उनके झुकाव को दर्शाते हैं।
यों भी विश्व क्रिकेट रंग और नस्ल के आधार पर भेदभाव की काली छाया से मुक्त नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका में काले और भूरे रंग के लोगों को खेल के मैदान में जबर्दस्त भेदभाव से जूझना पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया की कई राष्ट्रीय टीमों में अश्वेत खिलाड़ियों को जगह नहीं मिलती है। उपमहाद्वीप की टीमों और खिलाड़ियों के खिलाफ गोरे अंपायरों और रैफरियों के पक्षपातपूर्ण फैसलों को भला कौन भुला सकता है।
ऑस्ट्रेलियाई अंपायर डेरेल हार्पर और पाकिस्तानी टीम के बीच पिछले साल भड़का विवाद इसकी मिसाल है। हार्पर ने श्रीलंकाई स्पिनर मुरलीधरन को कई बार थ्रो करार दिया था। मुरली टेस्ट क्रिकेट में सबसे अधिक विकेटों के शिखर पर खड़े हैं। अँगरेज माइक डेनेस ने सचिन तेंडुलकर जैसे महान और साफ-सुथरे खिलाड़ी की नीयत पर शक किया था।
जैसा कि हमने पहले जिक्र किया है, सिडनी के विवादों को हल्के तौर पर नहीं लिया जा सकता है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने दौरे को निलंबित कर आईसीसी को सही संकेत दिया है। ठीक है, ऑस्ट्रेलिया सर्वश्रेष्ठ टीम है। लेकिन, उन्हें शिष्टता और खेल भावना के रास्ते पर लाने के लिए आईसीसी को सही कदम उठाना होगा। क्रिकेट को भद्रजनों का खेल रहने दिया जाए। उसे गोरों की मनमानी और किसी चैंपियन टीम की अभद्रता के ग्रहण से बचाने की जरूरत है।
भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे में उठे विवादों के तूफान ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के ढाँचे को एक बार फिर झकझोर दिया है। इस दौरे से उपजी कड़वाहट दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकती है। सिडनी टेस्ट में अंपायरों के गलत फैसलों से आहत भारतीय टीम के घाव हरभजनसिंह पर तीन टेस्ट मैचों की पाबंदी लगने के बाद और हरे हो गए हैं। शायद ही किसी टीम को खेल के मैदान में ऐसे पक्षपात और अन्याय का शिकार होना पड़ा है।
सिडनी में जो कुछ हुआ है, उससे भद्रजनों (जेंटलमैंस गेम) के खेल को नियंत्रित करते वाले प्रशासकों को सबक सिखाना चाहिए। अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कॉन्फ्रेंस (आईसीसी) ने अंपायरिंग के स्तर में सुधार और खिलाड़ियों को अनुशासित करने के वास्ते सख्त कदम नहीं उठाए तो इस खेल में अभद्रता की तमाम सीमाएँ टूट जाएँगी।
सिडनी टेस्ट में वेस्टइंडियन अंपायर स्टीव बकनर और अँगरेज मार्क बेंसन ने इस कदर गलतियाँ की हैं कि नौसिखियों को भी शर्म आ जाए। अंपायर भी मनुष्य हैं। उनसे गलतियाँ हो सकती हैं। आए दिन क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस और अन्य खेलों में अंपायरों की भूल-चूक मीडिया की सुर्खियों में जगह पाती है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला में सिडनी टेस्ट कोई पहला मैच नहीं है, जहाँ अंपायरों की भूलों के कारण किसी टीम को मैच गँवाना पड़ा है। ऐसे कई मैच हो चुके हैं, लेकिन सिडनी में ज्यादातर फैसले भारत के खिलाफ गए हैं। अंपायरों ने स्कूली बच्चों को मात करने वाला बर्ताव किया है। जो फैसले तीसरे अंपायर को सौंपे जा सकते थे, उन्हें क्या सोचकर खुद निपटाया गया। इससे अंपायरों की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है।
अंपायरों को पूरी तरह पाक-साफ मान लिया जाए और मानवीय भूल के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तब भी कुछ सवालों के जवाब खोजने की जरूरत है। ये सवाल हरभजनसिंह पर लगाई गई पाबंदी के मामले में भी उठते हैं। मसलन, माइकल क्लार्क द्वारा गांगुली के कैच का मामला देखिए। मार्क बेंसन ने फील्डिंग करने वाली टीम के कप्तान रिकी पोंटिग से पूछा कि कैच लिया गया है अथवा नहीं।
अब रिकी पोंटिंग महाराजा युधिष्ठिर और राजा हरिश्चन्द्र जैसे सत्यवादी तो हैं नहीं कि कह देते, माइकल क्लार्क ने जमीन से कैच उठाया है। बेंसन ने स्क्वायर लेग पर खड़े अपने साथी अंपायर बकनर से भी पूछने की जरूरत नहीं समझी थी। वे तीसरे अंपायर को मामला सौंपकर झंझट से बच सकते थे। फिर भी, बेंसन ने विवादास्पद तरीका अख्तियार किया। भारत टेस्ट बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था।
गांगुली से पहले द्रविड़ को बकनर ने गलत आउट दिया था। द्रविड़ के फैसले की हलचल स्टेडियम में महसूस की जा सकती थी। इतना सब होते हुए बेंसन ने सही रास्ता क्यों नहीं अपनाया था। जाहिर है, वे ऑस्ट्रेलिया की राह आसान बना रहे थे।
स्टीव बकनर ने भारत के खिलाफ जैसे फैसले दिए हैं, उसे देखते हुए उन्हें अंपायरों के अंतरराष्ट्रीय एलीट पैनल से फौरन विदा कर देना चाहिए। इस पैनल में काफी ठोक-बजाकर क्रिकेट खेलने वाले देशों के श्रेष्ठ अंपायरों को शामिल किया जाता है। आश्चर्य है, दुनिया की क्रिकेट को चलाने वाले एलीट पैनल में एक भी भारतीय नहीं है। पैनल के अंपायरों को आला दर्जे की सुविधाएँ मिलती हैं। उन्हें मैदान में प्रति घंटा 440 डॉलर की दर से मेहनताना मिलता है। उनका हर साल मेडिकल चेकअप होता है।
कुछ साल पहले तक बकनर उच्च स्तर के अंपायर थे। सभी खिलाड़ी उनकी पेशेवर क्षमता का सम्मान करते थे। हालाँकि भारत के सिलसिले में उनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। 2004-05 के ऑस्ट्रेलियाई दौरे में भारतीय कप्तान गांगुली ने अपनी रिपोर्ट में बकनर के खिलाफ तीखी टिप्पणियाँ की थीं। बकनर शारीरिक और मानसिक रूप से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव को झेलने में सक्षम दिखाई नहीं देते हैं।
क्रिकेट में अपार पैसा है। खासतौर से भारत में इस खेल में अरबों रुपए दाँव पर लगे हैं। इससे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है। लिहाजा, खेल को चलाने के सभी पहलुओं में उच्च कोटि के पेशेवर कौशल को ध्यान में रखने की जरूरत है। आईसीसी को अंपायरिंग का स्तर सुधारने के लिए विशेष प्रयास करना होंगे। अंपायरों के लिए आयु सीमा निश्चित की जाए। उनके प्रदर्शन की हर सीरिज के बाद बारीकी से समीक्षा होना चाहिए।
निम्न स्तरीय अंपायरिंग के कारण टेस्ट गँवाने के बाद भारतीय टीम को हरभजनसिंह पर लगे तीन टेस्ट मैचों के प्रतिबंध ने जोरदार आघात पहुँचाया है। मैदान के बाहर भी भारत के साथ अन्याय हुआ है। हरभजन पर ऑस्ट्रेलियाई एंड्रयू साइमंड्स पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप है। पता लगा है, हरभजन ने साइमंड्स को बिग मंकी (बड़ा बंदर- मलूका) कहा है।
मैच रैफरी माइक प्राक्टर ने ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की गवाही के आधार पर हरभजन को सजा दी है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अकेले तथाकथित रूप से प्रभावित पक्ष की गवाही को सही कैसे माना जा सकता है। अंपायरों के समान मैच रैफरी भी ऑस्ट्रेलिया के प्रभाव में लगते हैं।
आमतौर पर चैंपियन टीमों और उस्ताद खिलाड़ियों के खिलाफ फैसले देने में कई अंपायर और रैफरी हिचकिचाते हैं। हम यहाँ बेईमानी और पक्षपात के तत्व को अलग रखकर विचार करते हैं। पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर बताते हैं, उनकी राष्ट्रीय चैंपियन टीम बंबई को कई बार अपनी प्रतिष्ठा और ऊँचे कद के कारण अनजाने में अंपायरों का समर्थन मिल जाता था। ऑस्ट्रेलिया विश्व चैंपियन है। संभव है, कमजोर अंपायर चैंपियन टीम के आभामंडल की चकाचौंध में गलत फैसले देते हैं। आईसीसी ऐसे अंपायरों पर डंडा क्यों नहीं चलाता है।
सिडनी टेस्ट का घटनाक्रम यह भी बताता है कि हरभजन को क्यों निशाना बनाया गया है। मैदान में गाली-गलौज करने और बदसलूकी के मामले में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का कोई मुकाबला नहीं है। उनके क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल व अन्य खेलों के खिलाड़ी गाली बकने (स्लेजिंग), डराने-धमकाने की कला में पारंगत हैं।
इसे ऑस्ट्रेलियाई संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा माना जाता है। जैसा कि पूर्व कप्तान स्टीव वॉ कहते हैं, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने वाली टीमें यह नहीं समझती हैं कि स्लेजिंग या उसे जो कुछ भी नाम दें- करते हुए ऑस्ट्रेलियाई बच्चे बड़े होते हैं। वे स्कूल के मैदान और घर के पिछवाड़े में इसी तरह खेलते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में यह भी कहावत है, मैदान की बातचीत को मैदान में ही छोड़ दिया जाना चाहिए। फिर रिकी पोंटिंग ने हरभजन के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी की शिकायत क्यों की है। मतलब साफ है, वे इस तरह के हथकंडे अपनाकर तगड़ी चुनौती दे रही भारतीय टीम के इरादों को तोड़ना चाहते हैं।
दरअसल, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बरसों से जो करते रहे हैं, अब उन्हें उसका जवाब मिलने लगा है। पोंटिंग की टीम टेस्ट मैचों में लगातार 16वीं जीत हासिल करना चाहती थी। इसलिए उसने सिडनी में खेल भावना को ताक पर रख दिया। अंपायर बेंसन और रैफरी माइक प्रोक्टर के एकतरफा फैसले ऑस्ट्रेलिया के प्रति उनके झुकाव को दर्शाते हैं।
यों भी विश्व क्रिकेट रंग और नस्ल के आधार पर भेदभाव की काली छाया से मुक्त नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका में काले और भूरे रंग के लोगों को खेल के मैदान में जबर्दस्त भेदभाव से जूझना पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया की कई राष्ट्रीय टीमों में अश्वेत खिलाड़ियों को जगह नहीं मिलती है। उपमहाद्वीप की टीमों और खिलाड़ियों के खिलाफ गोरे अंपायरों और रैफरियों के पक्षपातपूर्ण फैसलों को भला कौन भुला सकता है।
ऑस्ट्रेलियाई अंपायर डेरेल हार्पर और पाकिस्तानी टीम के बीच पिछले साल भड़का विवाद इसकी मिसाल है। हार्पर ने श्रीलंकाई स्पिनर मुरलीधरन को कई बार थ्रो करार दिया था। मुरली टेस्ट क्रिकेट में सबसे अधिक विकेटों के शिखर पर खड़े हैं। अँगरेज माइक डेनेस ने सचिन तेंडुलकर जैसे महान और साफ-सुथरे खिलाड़ी की नीयत पर शक किया था।
जैसा कि हमने पहले जिक्र किया है, सिडनी के विवादों को हल्के तौर पर नहीं लिया जा सकता है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने दौरे को निलंबित कर आईसीसी को सही संकेत दिया है। ठीक है, ऑस्ट्रेलिया सर्वश्रेष्ठ टीम है। लेकिन, उन्हें शिष्टता और खेल भावना के रास्ते पर लाने के लिए आईसीसी को सही कदम उठाना होगा। क्रिकेट को भद्रजनों का खेल रहने दिया जाए। उसे गोरों की मनमानी और किसी चैंपियन टीम की अभद्रता के ग्रहण से बचाने की जरूरत है।

