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Written By WD

मेल-मिलाप का संस्कार

(प्रायश्चित और पाप स्वीकार)

मेल मिलाप संस्कार
'अपने पापों को स्वीकार करने में शर्म मत करो।' क्योंकि पाप हमें ईश्वर से अलग कर देता है... यह मेल-मिलाप का संस्कार है। (प्रायश्चित-पाप स्वीकार) जो हमें वापस लाता है और ईश्वर से पुनः मिलाता है।

'वह जो अपने अपराधों को छिपाता है- वैभव प्राप्त नहीं करेगा, परन्तु जो पाप स्वीकार करता है और उनका परित्याग करता है, उसे दयालुता प्राप्त होगी।' (सूक्ति)

जब ख्रीस्त ने अपनी कलीसिया की स्थापना की, तब उसने पाप क्षमा करने की शक्ति अपने प्रेरितों और उनके उत्तराधिकारियों को प्रदान की।

लोग उनके पाप स्वीकार करते हैं और वास्तव में प्रेरित पवित्र त्रित्व के नाम पर उनके पाप क्षमा कर देता है, जब वह कहता है- 'मैं तुम्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर क्षमा करता हूँ। आमेन'।

जो कोई भी धर्मग्रंथ पढ़ता है, वह जानता है कि ख्रीस्त ने पापों को क्षमा किया था। वह ऐसा कर सका, क्योंकि वह पवित्र त्रित्व का दूसरा जन है, सच्चा ईश्वर, सच्चा मनुष्य।

उसने मरिया मग्दलेना के पाप क्षमा किए, उसने लकवे से पीड़ित व्यक्ति के पाप क्षमा कर दिए जब उसने चंगा होने के लिए पूछा, 'लेकिन जिससे आप जान लें कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है, वे अर्द्धांगी से बोले, 'मैं तुमसे कहता हूँ, उठो अपना बिछावन उठा लो और अपने घर चले आओ। उसी क्षण, उसके सामने ही वह उठा और जिस पर वह पड़ा था, उसको उठाकर ईश्वर का गुणगान करता हुआ, अपने घर चला गया।' (लूकस 5:24-25)

ख्रीस्त ने क्रूस पर भले डाकू को क्षमा कर दिया, उसने संत पेत्रुस के पापों को क्षमा कर दिया।

उसके शत्रु अचंभित हो गए कि वह पाप क्षमा करता है... परन्तु वह पाप क्षमा के लिए पैदा हुआ था और पाप क्षमा के लिए ही मरा।

'उसी दिन अर्थात्‌ सप्ताह के प्रथम दिन (उसके पुनरुत्थान के दिन) संध्या के समय शिष्यगण यहूदियों के डर से द्वार बंद करके जमा हुए थे। वहीं येसु आए और उनके बीच खड़े होकर उनसे कहा, 'तुम्हें शांति मिले।' इतना कहकर येसु ने उनको अपने हाथ और अपनी बगल दिखला दी। शिष्य येसु को देख आनंद विभोर हो गए। येसु ने उनसे फिर कहा, 'तुम्हें शांति मिले, जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं तुमको भेजता हूँ।' इतना कहकर येसु ने उन पर फूँक कर उनसे कहा, 'पवित्रात्मा को ग्रहण करो, जिनके पाप तुम क्षमा कर दोगे, उनके क्षमा हो जाएँगे, जिनके रोके रखोगे, उनके रुके रहेंगे।' (योहना : 20:19-23)
ख्रीस्त चाहता था कि यह शक्ति दूसरों को भी बाँट दी जाए, इसलिए उसने कलीसिया की स्थापना की और दुनिया के अंत तक के लिए लोगों को संस्कार प्रदान किए।

'इसलिए जाओ, जब जातियों को शिष्य बनाओ, उनको पिता और पुत्र और पवित्रात्मा के नाम में बपतिस्मा दो और जो-जो आज्ञाएँ तुम्हें दी हैं, उन सबका पालन करना उन्हें सिखलाओ। और सुनो, संसार के अंत तक मैं सब दिन तुम्हारे साथ हूँ।' (मत्ती 28:19-20)

क्या पाप स्वीकार कठिन है?
यह कठिन नहीं है। यह सामान्य और स्वाभाविक है। जब एक व्यक्ति उलझन में रहता है, तब और किसी से कहकर मन की शांति प्राप्त करना चाहता है और मन की शांति प्राप्त करने के लिए पाप स्वीकार पीठिका के अलावा और कोई दूसरी अच्छी जगह नहीं है। सबसे बड़ी सांत्वना की बात तो यह होती है कि पुरोहित बहुत ही सख्त रहस्य से बँधा होता है कि तुम्हारे पापों को किसी को कभी नहीं बताएगा। हम इसको 'पाप स्वीकार की मुहर' कहते हैं। (जो चाहते हैं, उनके लिए आमने-सामने पाप स्वीकार करने की अनुमति है)।

स्वयं पुरोहित पाप क्षमा करता है
हाँ, स्वयं पुरोहित को पाप क्षमा करने की शक्ति है। क्या ख्रीस्त ने अपने प्रेरितों से नहीं कहा था? 'जिनके पाप तुम क्षमा करते हो, उनके क्षमा होते हैं और जिनके पापों को तुम रोक रखते हो, उनके रुके रहते हैं। (यो. 20:25)

पाप स्वीकार क्यों?
यदि ईश्वर चाहता तो तुम्हारे पाप प्रत्यक्ष में क्षमा कर देता, लेकिन वह चाहता है कि मनुष्य उसके प्रेरितों और उनके उत्तराधिकारियों, पुरोहितों द्वारा निर्देशित किए जाएँ, क्योंकि हमें एक मानव न्यायाधीश की आवश्यकता है, जो हमारी अंतःकरण की कठिन समस्याओं में मदद कर सके और इसलिए उसने पाप क्षमा करने की शक्ति प्रदान की। जब उसने अपने प्रेरितों से कहा, जिनके पाप तुम क्षमा कर दोगे, उनके क्षमा हो जाते हैं, जिनके रोक रखोगे, उनके रुके रहते हैं।' (योहन 20:23)

बारम्बार पाप स्वीकार- पाप शंकालु व्यक्तियों और जो मूर्खतापूर्ण उत्सुकताओं से चिंतित रहते हैं, उनके लिए सलाह योग्य नहीं है।

बारम्बार पाप स्वीकार को उपयुक्त बताया गया है, क्योंकि इसमें...
(क) प्रतिदिन के अंतःकरण की जाँच से स्वयं का वास्तविक ज्ञान बढ़ता है।
(ख) ख्रीस्तीय नम्रता विकसित होती है।
(ग) बुरी आदतें सुधरती हैं।
(घ) आध्यात्मिक लापरवाही और शिथिलता पर विजय प्राप्त होती है।
(ङ) अंतःकरण की शुद्धि होती है।
(च) इच्छाशक्ति सुदृढ़ होती है।
(छ) स्वयं पर वश (काबू) प्राप्त किया जाता है।
(ज) और कृपा, स्वयं संस्कार के गुणों में वृद्धि करती है।

पाप स्वीकार ही एक ऐसा न्यायाधिकरण है, जहाँ जब एक व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे सिर्फ दोषमोचन के वाक्य को सुनाया जाता है। यह कितना गलत है और सलाह कितनी मूर्खतापूर्ण है कि पाप स्वीकार एक असहनीय बोझ है। वह जो पाप के द्वारा अपमानित है, उसे इन शर्तों को बतलाने का अधिकार है, जिससे पाप क्षमा किया जाएगा और येसु ख्रीस्त ने पाप स्वीकार संस्कार की स्थापना कर बिलकुल यही किया है। यह अपने पवित्र हृदय की दयालुता और प्रेम की सबसे शक्तिशाली खोज है। इसी का अस्तित्व हमें कृतज्ञ बनाएगा, क्योंकि हम कलीसिया के सदस्य हैं, जो कि ख्रीस्त द्वारा स्थापित है और अपने बच्चों को ऐसा संस्कार प्रदान करती है।

एक अच्छा पाप स्वीकार कैसे करें...

पाप स्वीकार करने जाने के पूर्व क्या करें...
प्रार्थना करो और ईश्वर से सहायता की याचना करो...

अपने अंतःकरण की जाँच करते समय, ईश्वर की इस आज्ञाओं का और कलीसिया के नियमों को पुनः दोहराओ और ईमानदारी से स्वयं से पूछो कि किस आज्ञा या नियम में तुम असफल हुए... या उसके विरुद्ध गए हो और कितनी बार? यदि ठीक संख्या याद न हो तो बताओ 'करीबन... बार'

पाप स्वीकार पीठिका में क्या करना है...
अपने मौके का इंतजार करो... तब जाओ, घुटने टेको और कहो, 'फादर मुझे आशीर्वाद दो, क्योंकि मैंने पाप किए हैं।'

'यह (एक सप्ताह या एक माह या जितना भी लंबा समय हो) मेरे अंतिम पाप स्वीकार से है।

ये मेरे पाप हैं (उनके नाम बताओ और करीब कितनी बार किए हैं)।

पुरोहित को तुम्हारे समस्त पाप कहने के बाद तुम्हें कहना चाहिए, मैं अपने इन पापों और अतीत में किए गए समस्त पापों के लिए सच्चे दिल से पछतावा करता हूँ और आप से (फादर) क्षमा और आशीष माँगता हूँ।'

पुरोहित प्रश्न पूछ सकता है (सीधे उत्तर दो) और एक शोधन-कार्य देता है। तब पुरोहित पाप क्षमा के जो शब्द कहते हैं, उसे ध्यान से सुनो... या पछतावे की प्रार्थना बोलो।

तब पाप स्वीकार पीठिका छोड़ो और गिरजे में एक एकांत स्थान में जा अपना दंड पूरा करो (वे प्रार्थनाएँ, जिन्हें पुरोहित ने कहने के लिए दी हैं) और ईश्वर को संपूर्ण हृदय से धन्यवाद दो, जिसने तुम्हारे पापों को क्षमा कर दिया और उससे यह प्रतिज्ञा करो कि भविष्य में तुम इन पापों से दूर रहोगे।

पापों के लिए प्रश्चाताप

पापों के लिए पश्चाताप होना ही चाहिए... जो पाप किए गए हैं, उनके लिए पश्चाताप नहीं करने से वे क्षमा नहीं होते।

हमारा पश्चाताप उसी समय पूर्ण होता है, जब हम सच्चे दिल से दुःखी होते हैं कि हमने ईश्वर को नाराज किया, जो कि हमारे प्रति इतना अच्छा है।

हमारा पश्चाताप उस समय अपूर्ण होता है, जब हम इस बात से दुःखी होते हैं कि हमने ईश्वर को नाराज किया और नरक का भय रखते हैं कि जो पापी पश्चाताप नहीं करते उन्हें ईश्वर सजा देता है।

यद्यपि अपूर्ण पश्चाताप या दुःख पाप स्वीकार के लिए काफी होता है, हमें अपने पश्चाताप या दुःख को सदैव जहाँ तक संभव हो ईमानदार और पूर्ण बनाना चाहिए।

पाप स्वीकार के बाद

अपने पापों के लिए प्रायश्चित करो। मेल-मिलाप के संस्कार में ईश्वर पुरोहित को यह शक्ति देता है कि वे पापियों को पुनः कृपा की अवस्था में ले आते हैं। फिर भी यदि पाप स्वीकार के पश्चात कुछ क्षमनीय पाप छूट जाते हैं तो उससे अस्थायी सजा बाकी रह जाती है। तब यह पाप पश्चाताप की प्रार्थना के द्वारा क्षमा हो जाते हैं, जो पुरोहित हमें करने के लिए देते हैं।

प्रायश्चित के कुछ दूसरे तरीके भी पूर्ण किए जाते हैं। जैसे- प्रार्थना, उपवास और परहेज, भिक्षा-दान, अपने साथ रहने और काम करने वालों के साथ सहनशील बने रहना, बीमारी की अवस्था में अपने और दूसरों के पापों के लिए अथवा शोधकाग्नि की आत्माओं के लिए अपने दुःख-दर्दों को अर्पित कर देना, आत्मिक और शारीरिक दयामय कार्यों को करना और दण्डमोचन को प्राप्त करना।

दंडमोचन क्या है?

दंडमोचन से पाप की क्षमा मिलती है। यह पापों के संपूर्ण दंडों की क्षमा है। काथलिक धर्ममंडली के पास यह अधिकार है, जिससे न केवल पाप क्षमा होती है, परन्तु अस्थायी पापों की क्षमा भी मिलती है।

ख्रीस्त ने यह अधिकार दिया, जब उसने पेत्रुस से कहा, 'मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की चाबियाँ दूँगा' और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खुला रखोगे, वह स्वर्ग में भी खुला रहेगा... (मत्ती 16:19)

दंडमोचन बाइबिल पढ़ने के द्वारा, क्रूस रास्ता करने से, स्कापुलर पहनने या पवित्र मेडल पहनने और दूसरे बहुत से तरीकों से जो प्रार्थना पुस्तक में दर्शायी गई हैं, प्राप्त किए जा सकते हैं।

वे शोधकाग्नि की असहय आत्माओं के लिए भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
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