बुद्धं शरणं गच्छामि

एस धम्मो सनंतनो


निर्वाण : सुजाता नाम की एक महिला ने वटवृक्ष से मन्नत माँगी थी कि मुझको यदि पुत्र हुआ तो खीर का भोग लगाऊँगी। उसकी मन्नत पूरी हो गई तब वह सोने की थाल में गाय के दूध की खीर लेकर वटवृक्ष के पास पहुँची और देखा की सिद्धार्थ उस वट के नीचे बैठे तपस्या कर रहे हैं।


सुजाता ने इसे अपना भाग्य समझा और सोचा कि वटदेवता साक्षात हैं तो सुजाता ने बड़े ही आदर-सत्कार के साथ सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा 'जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई है यदि तुम भी किसी मनोकामना से यहाँ बैठे हो तो तुम्हारी मनोकामना भी पूर्ण होगी।'
बोधीवृक्ष : उसी रात को ध्यान लगाते समय सिद्धार्थ को सच्चा बोध हुआ। वहीं उन्हें बुद्धत्व उपलब्ध हुआ। भारत के बिहार में बोधगया में आज भी वह वटवृक्ष विद्यमान है जिसे अब बोधीवृक्ष कहा जाता है। इस वृक्ष को बचाने के लिए विदेशों से कई जाने-माने वैज्ञानिक हर वर्ष इसका परीक्षण करने के लिए आते हैं और जो भी जरूरी होता है इस वृक्ष की उम्र बढ़ाने के उपाय करते हैं। इस वृक्ष को विश्व विरासत की सूची में भी शामिल किया गया है। सम्राट अशोक इस वृक्ष की एक शाखा श्रीलंका ले गए थे, वहाँ भी यह वृक्ष है।

बोधी प्राप्ति की घटना ईसा से 528 वर्ष पूर्व की है जब सिद्धार्थ 35 वर्ष के थे। इस बोधीवृक्ष के नीचे वे बोधी प्राप्ति के बाद चार सप्ताह तक बैठे रहे। इसके बाद वे सच्चे और सनातन धर्म का उपदेश करने निकल पड़े।

मैत्रेय : ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन दिया था कि मैं 'मैत्रेय' से पुन: जन्म लूँगा। तब से अब तक 2500 साल बीत गए। बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे, लेकिन वह प्रयास भी असफल सि‍द्ध हुआ। अंतत: ओशो रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी।
धम्मं शरणं गच्छामि:-
धर्मचक्र प्रवर्तन : बोधी प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ कहलाने लगे। ज्ञान उपलब्ध होने के बाद वे सारनाथ पहुँचे। वहीं पर उन्होंने लोगों को मध्यम मार्ग अपनाने के लिए कहा। दुःख के कारण बताए और दुःख से छुटकारा पाने के लिए आष्टांगिक मार्ग बताया। तरह-तरह के देवता, यज्ञ, पशुबलि और व्यर्थ के पूजा-पाठ की निंदा की। अहिंसा पर जोर दिया।
80 वर्ष की उम्र तक गौतम बुद्ध ने जीवन और धर्म के प्रत्येक पहलू पर दिए और लोगों को दीक्षा देकर ‍बुद्ध शिक्षा के लिए प्रचार पर भेजा। सुद्धोधन और राहुल ने भी उनसे दीक्षा ली।

बुद्ध दर्शन के मुख्‍य तत्व : चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएँ, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं।
बुद्ध के गुरु : गुरु विश्वामित्र, अलारा, कलम, उद्दाका रामापुत्त आदि।



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