डर @ द माल का सबसे बड़ा आकर्षण निर्देशक पवन कृपलानी है जिनकी पिछली फिल्म 'रागिनी एमएमएस' एक बेहतरीन हॉरर फिल्म थी। पवन अपनी दूसरी फिल्म में निराश करते हैं और बजाय उन्होंने कुछ नया करने के इस हॉरर मूवी में वही मसालों का उपयोग किया है जिन्हें हम सैकड़ों हॉरर मूवीज में देख चुके हैं। दर्शकों को डराने के लिए उन्होंने सब कुछ किया, जिनमें से कुछ कारगर सिद्ध हुए और ज्यादातर बेकार।
यूं भी हॉरर फिल्मों की कहानियां और सिचुएशन लगभग एक जैसी ही होती है और सारा दारोमदार प्रस्तुतिकरण पर आ टिकता है। 'डर @ द माल' की न कहानी में दम है और न प्रस्तुतिकरण में। फिल्म में आगे क्या होने वाला है इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। ऐसे में हॉरर फिल्म का सारा रोमांच खत्म हो जाता है।
कहानी है एक मॉल की जिसके बारे में अफवाह है कि उसमें भूतों का वास है। मॉल के मालिक उसकी रिओपनिंग करते हैं ताकि लोग वहां आने लगे और वे मॉल को बेच सके। सुरक्षा का जिम्मा वे एक नए सिक्यूरिटी ऑफिसर विष्णु (जिमी शेरगिल) को सौंपते हैं। क्या विष्णु रहस्य का पर्दाफाश कर पाएगा या शिकार बन जाएगा?
निर्देशक पवन ने इस साधारण सी कहानी को खूब उलझाने की कोशिश की है और फिल्म को लंबा खींचा है, इसका परिणाम ये हुआ कि फिल्म बेहद लंबी और उबाऊ लगती है। दर्शकों को डराने की उनकी ज्यादातर कोशिशें नाकामयाब हुई हैं। कई दृश्य अन्य फिल्मों से प्रेरित है। फ्लेशबैक सीन का जरूरत से ज्यादा उपयोग है और इन्हें छोटा किया जा सकता था। हॉरर फिल्मों में गाने रखने का कोई अर्थ नहीं है। बैकग्राउंड म्युजिक जरूर ठीक-ठाक है।
जिमी शेरगिल अच्छे कलाकार हैं और इस तरह की भूमिकाएं निभाना उनके लिए बेहद आसान है। नुसरत भरूचा और आरिफ जकारिया ने अपना काम गंभीरता से किया है।