राहुल देव बर्मन के बारे में खास बातें: 'प' ने बनाया पंचम

कामयाब पिता की संतान भी कामयाब हो, ऐसा बहुत कम होता है क्योंकि विशाल वृक्ष के नीचे पौधा ठीक से पनप नहीं पाता। लेकिन विरले उदाहरण भी हैं। जैसे सचिन देव बर्मन और आर.डी. बर्मन। बर्मन परिवार ने अपने मधुर संगीत के जरिये करोड़ों लोगों का मनोरंजन किया है। निराशा के समय प्रेरणा दी और दर्द के समय अपने संगीत के जरिये राहत। सचिन देव बर्मन नामी थे और उनके घर संगीत जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों का आना-जाना लगा रहता था। उनकी महफिलें जमती थीं और छोटे राहुल भी उसमें गुपचुप हिस्सा लिया करते थे। संगीत का जादू उन पर बचपन से छा गया था।
'प' ने बनाया पंचम
का बचपन कलकत्ता में दादी के पास गुजरा था। अक्सर वह मुंबई पिता सचिनदेव के घर आते-जाते रहते थे। सचिनदा के घर के पास अनादि बनर्जी का निवास था। वहां 'स्ट्रगलर-म्युजिशियन-सिंगर्स' का जमावड़ा लगा रहता था। उन्हीं के घर पर उस दौर के लोकप्रिय गीत 'डोल रही है नैया मेरी' की रिहर्सल हुई थी। दादा मुनि अशोक कुमार बालक राहुल से भी सुर लगाने को कहते। राहुल सुर लगाते समय सा-रे-ग-म से लेकर जब 'प' पर आते, तो अटक जाया करते थे। इसी बात को लेकर हंसी-मजाक में उनका नामकरण हो गया -पंचम। यह सारी जिंदगी उनकी पहचान बन गया।

मेहमूद ने दिया पहला अवसर
की वजह से आरडी को फिल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फिल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की जरूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। मेहमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। मेहमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें जरूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के जरिये मेहमूद ने अपना वादा निभाया।
नाम सचिन का, काम राहुल का
संगीत विशेषफ पंकज राग ने अपनी पुस्तक धुनों की यात्रा में पंचम को लेकर कुछ दिलचस्प बातें उजागर की हैं। पंचम बचपन से ही संगीतकार बनने की तमन्ना लेकर बड़े हो रहे थे। अपने पिता की कई फिल्मों की धुनें उन्होंने रची थी। परदे पर नाम तो सचिन-दा का गया था। पंकज राग लिखते हैं कि नवकेतन की फिल्म 'फंटूश' का मशहूर गीत 'आँखों में क्या जी? रूपहला बादल' और 'अरे यार मेरी तुम भी हो गज़ब' की धुनों को कम्पोज करने का श्रेय भी पंचम को है। फिल्म सोलवां साल का माउथ ऑर्गन और उसकी धुन पर थिरकता गाना 'है अपना दिल तो आवरा' पंचम की कलाकारी था। राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म दोस्ती का माउथ ऑर्गन बजाकर तो उन्होंने कमाल कर दिया था।

एसडी बर्मन हमेशा आरडी को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आरडी को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एसडी ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफी बीमार थे। आरडी ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फिल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आरडी को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।
कैबरे डांस को नई पहचान
साठ-सत्तर के दशक में हिन्दी फिल्मों में कैबरे डांस की प्रस्तुति लगभग अनिवार्य हुआ करती थी। इसके लिए उस दौर की कैबरे डांसर्स का अपनी कला में कुशल होना भी था। पहली कतार में हेलन, पद्मा खन्ना, बिंदू, लक्ष्मी छाया, टी-सिस्टर्स (जयश्री एवं मीना), कल्पना अय्यर के नाम गिनाए जा सकते हैं। इन सबकी सिरमौर हेलन रही हैं। राहुल देव ने अपने संगीत के जरिये कैबरे को नई पहचान देकर उसे दर्शनीय के साथ श्रवणीय भी बनाया। फिल्म कारवां (1971) का यह कैबरे गीत 'पिया तू अब तो आ जा' (आशा-आरडी) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। फिल्म जीवन साथी (1972) का गीत 'आओ न गले लगा लो ना' में आशा की आवाज का मादक तथा उत्तेजक उपयोग करने में आरडी सफल रहे हैं। आशा से कैबरे सांग गवाकर उनकी आवाज का नशीला जादू जगाने में आरडी पूरी तरह कामयाब रहे हैं। चंद और उदाहरण प्रस्तुत हैं-
* तेरी-मेरी यारी बड़ी पुरानी (चरित्रहीन/1974)
* आज की रात कोई आने को है... (अनामिका/1973)
* आज की रात, रात भर जागेंगे (जागीर/1984)

इतना ही नहीं आरडी ने लता मंगेशकर जैसी कोमल और मधुर आवाज से भी कैबरे-गीत गवाकर श्रोताओं को चकित किया है। जैसे-
* शराबी, शराबी मेरा नाम हो गया... (चंदन का पलना)
* हां जी हां, मैंने शराब पी है (सीता और गीता)

इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल...
किशोर कुमार और आशा भोसले आरडी के पसंदीदा गायक-गायिका रहे हैं, यह बात सब जानते हैं। उन्होंने मुकेश से कम गवाया, मगर जितना भी गवाया वह लोकप्रिय हुआ है। सबसे अधिक राज कपूर की फिल्म 'धरम करम' (1976) रही। 'इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल' गीत की धुन पह ली बार सुनकर राजकपूर ने फाइनल कर दी थी। इसकी लोकप्रियता इस बात से पता चलती है कि यह बिनाका गीतमाला के सालाना प्रोग्राम में दूसरी पायदान पर बजा था। लता के साथ फिल्म 'तीसरा कौन' (1968) में मुकेश से गवाया था- प्यार का फसाना, बना ले दिल दीवाना' जब श्रोताओं ने बेहद पसंद किया, तो यह सिलसिला फिल्म 'कटी पतंग' (1970) के गीत 'जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा' पर जाकर ठहरा था। इसी तरह फिल्म 'फिर कब मिलोगी' का स्पेनिश धुन पर आधारित यह गीत 'कहीं करती होगी वो मेरा इंतजार' ऐसा गीत है जो आगे चलकर रीमिक्स वालों के लिए चांदी की फसल काटने जैसा साबित हुआ। मुकेश से गवाए कुछ और लोकप्रिय गीतों की संक्षिप्त तालिका देकर बाकी काम श्रोताओं पर छोड़ते हैं-
* जिंदगी में आप आए, हो गई दुनिया हसीं (छलिया/1973/ वाणी जयराम-मुकेश)
* सूरज से फिर किरण का नाता (हंगामा/1971/ लता-मुकेश)
* हां, तो मैं क्या कह रहा था (राजा रानी/लता-मुकेश)
* सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देती (मुक्ति/1977/मुकेश)
* लल्ला लल्ला लोरी (मुक्ति/1977/मुकेश)

 

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