मैं बहुत ही स्वार्थी कलाकार हूँ : दिलजीत दोसांझ

"मैं बहुत ही सेल्फिश कलाकार हूँ। अभी मैं सिर्फ अपने आप को प्रमोट कर रह हूँ मैं कला की किसी भी विधा को प्रमोट करने की बात सोच भी नहीं सकता।" ये कहना है दिलजीत दोसांझ का।

आमतौर पर पॉलिटिकली करेक्ट बातें करने वाले कलाकारों से हट कर दो टूक बात कहते हैं कि वो अभी सिर्फ और सिर्फ अपने आप पर ध्यान देना चाहते हैं। अपनी पंजाबी फिल्म 'छड़ा' के बारे में बात करते हुए दिलजीत वेबदुनिया को बताते हैं कि मेरा फ़िल्मों में आना भी फिल्म की हीरोइन नीरू जी की वजह से ही हुआ।

मेरा दोस्त एक फिल्म की कहानी लिख रहा था और मैं भी उसी शहर में शादी में गाना गाने के लिए गया हुआ था। उसका फोन आया कि जिमी शेरगिल और नीरू जी की फिल्म में एक छोटा सा रोल है। क्या तुम कर लोगे? मैंने हाँ कह दी क्योंकि शादी वाले फ़ंक्शन हो गया था। तो मैं शूट पर चला गया।

सेट पर जाकर पहली बार मैंने पहली बार वैनिटी वैन देखी। फिर नीरू जी की वैन भी देखी। मेरा पहला शॉट भी नीरू जी के साथ ही था। मेरे लिए तो यही काफी था कि नीरू जी को देखने को मिल रहा है। वैसे भी नीरू जी बहुत बड़ा नाम हैं।

आपने और नीरू के साथ पहली बार काम किया। तबब और अब में कोई अंतर आया है?
नहीं। मैं उनसे सेट पर बहुत बात नहीं कर पाता। हम अपने अपने शॉट दे कर चुपचाप बैठ जाते हैं। मेरे लिए नीरू जी आज भी वही बड़ी हीरोइन हैं और मैं उनका फैन। मेरे लिए आज भी उनसे बहुत सारी बातें करना मुश्किल है इसलिए मैं उनसे कम ही बोलता हूँ।

'छड़ा' का क्या मतलब होता है?
पंजाब में जब किसी लड़के की शादी नहीं हो पाती है या वो बहुत समय तक कुंआरा रहता है तो उसे छड़ा बोलते हैं। गाँव वाले उससे मज़ाक करते रहते हैं या टाँग खींचते रहते हैं और वो भी कभी इस बात का बुरा नहीं मानता।

इस टॉपिक पर क्यों फिल्म बनाने की सूझी?
एक दिन सुबह मैं उठा उस समय मुंबई में ही था और पता नहीं क्या सूझा तो लगा कि इस टॉपिक पर फिल्म बनाई जाए। वैसे भी एक साल हो गया था किसी कॉमेडी फिल्म में काम नहीं किया था। लोगों से भी ये ही बात सुनने को मिल रही थी। अब मेरा तो कोई अपना प्रोडक्शन हाउस भी नहीं है। मैंने प्रोडक्शन हाउस से संपर्क किया और उन्हें टाइटल रजिस्टर कराने के लिए बोल दिया। मुझे लगा था कि अभी तक तो ये टाइटल किसी ने रजिस्टर्ड कर रखा होगा, लेकिन ये फ्री था। हमने ले लिया और देखते ही देखते फिल्म बना ली।

आपका हिंदी फ़िल्मों और हिंदी भाषियों में नाम होने लगा है फिल्म और टीवी के ज़रिए। इसका फायदा फिल्म को होगा?
पता नहीं। अभी तक तो नहीं हुआ, लेकिन मैंने पाया कि मेरी कुछ फ़िल्में जैसे 'जट एंड जूलिएट' या 'पंजाब 1984' में मुझे लोगों ने पसंद किया है। अब मुंबई या बाकी की जगह की बात कर लें तो जिन लोगों को मैं पसंद आया उनके लिए ये फिल्म मैं पंजाब के बाहर भी प्रमोट कर रहा हूँ वरना मैं भी जानता हूं कि मेरी फिल्म को इतने थिएटर भी नहीं मिलेंगे। एक बात है कि मेरी फिल्म की कहानी बहुत बढ़िया है। हमने सब-टाइटल भी डाले हैं फिल्म में ताकि जो भाषा ना समझ सके वो भी बात समझ लें और फिल्म का मज़ा भी किरकिरा ना हो।

 

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