ramcharitmanas
Mon, 14 Sep 2026

Notifications

  1. मनोरंजन
  2. बॉलीवुड
  3. आलेख
  4. Salman Khan, Chinkara

आत्महत्या हिरण ने की और दोष सलमान पर... बहुत नाइंसाफी है!

सलमान खान
फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि नायक को जब न्याय नहीं मिलता तो वह कानून अपने हाथ में लेकर दोषियों को सजा सुनाता है। 1992 में धर्मेन्द्र अभिनीत एक फिल्म रिलीज हुई थी, नाम है 'तीसरी अदालत'। फिल्म में धर्मेन्द्र समानांतर अदालत चलाकर दोषियों को त्वरित सजा देते थे और उन लोगों को न्याय दिलाते थे जिनका कानून पर से विश्वास उठ गया था। तब फिल्म की आलोचना की यह कह कर की गई थी कि फिल्म लोगों में कानून के प्रति अविश्वास बढ़ाती है। 
 
पिछले दिनों एक फैसला ऐसा आया है जिसकी वजह से देश के कानून के प्रति लोगों में विश्वास कम हुआ है। सोशल मीडिया वो थर्मामीटर है जिसके जरिये देश की जनता की सोच का तापमान मोटे तौर पर मालूम किया जा सकता है। सोशल मीडिया को जनता की अदालत कहा जा सकता है क्योंकि लोग तुरंत किसी भी मसले पर राय रखते हैं या फैसला सुना देते हैं। फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्स एप जैसे प्लेटफॉर्म के जरिये उनकी राय करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है। कुछ तो बड़े क्रिएटिव रहते हैं। तुरंत फोटो या कॉर्टून बना देते हैं और हमें पता चलता है कि प्रतिभा की कमी नहीं है। 
 
खैर, तीसरी अदालत या जनता की अदालत की बात इसलिए की जा रही है क्योंकि सलमान खान को जोधपुर हाईकोर्ट ने काला हिरण और चिंकारा शिकार के मामले में बरी कर दिया है जबकि निचली अदालत ने सजा सुनाई थी। कानून ने सलमान को छोड़ दिया लेकिन जनता की नजर में वे दोषी हैं, ऐसा सोशल मीडिया का मिजाज कहता है।  
 
ऐसे संदेशों की बाढ़ आ गई‍ जिनमें आम लोगों ने अपने गुस्से का इजहार किया। तंज भी कसे। एक ने लिखा कि यदि सलमान बरी नहीं होते तो पैसे से उसका विश्वास उठ जाता। ये भी पढ़ने को मिला कि- 'हिरण ने आत्महत्या की और दोष सलमान पर लगा... बहुत नाइंसाफी है, शुक्र है कोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।' एक फोटो भी वायरल हुआ जिसमें हिरण को बंदूक अपनी कनपटी पर लगाकर आत्महत्या करते हुए दिखाया जा रहा है। एक फोटो हजार शब्दों से भी ज्यादा बोलता है और यह फोटो इस बात का उदाहरण है। 
मैसेजेस से स्पष्ट है कि जनता में फैसले को लेकर रोष है। उनका यकीन इस बात पर बढ़ा है कि शक्तिशाली और अमीर लोग कानून से परे हैं। वे अपनी शक्तियों के बल पर फैसले को तोड़-मोड़ सकते हैं। कानून का कोड़ा केवल गरीबों के लिए है।
 
अब तो ये भी खबरें आ रही हैं कि मुख्य गवाह को तो बुलाया ही नहीं गया ताकि सलमान का बच निकलने का रास्ता साफ हो जाए। 
 
फुटपाथ कर सोए लोगों को कुचलने का मामला भी सलमान पर चला था, लेकिन आंकी-बांकी गलियां उनके काम आईं। सवाल यह उठा कि फिर कार कौन चला रहा था। तब भी लोगों ने रोष व्यक्त किया था। 
 
जरूरी नहीं है कि जो जनता सोच रही है वही सही हो। कई बार लोग भावुकता या धर्म का चश्मा पहन कर भी टिप्पणी करते हैं। लेकिन यह पता लगाना भी कठिन नहीं है कि जो लहर चल रही है वह कितनी गहरी है और कितनी सतही। सोशल मीडिया की ताकत दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। नरेंद्र मोदी को विजय दिलाने में इसकी अहम भूमिका थी। इसकी ताकत से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 
हिरण की आत्महत्या वाला फोटो का वायरल होना दर्शाता है कि भले ही देश की अदालत सलमान को दोषी नहीं मानती है, लेकिन सोशल मीडिया की अदालत इस फैसले से सहमत नहीं है।
 
ये भी पढ़ें
सुनिए... सुल्तान से फिल्म बनाना सीखिए...