बिहार में सर्वदलीय बैठक में जातिगत जनगणना पर बनी सहमति, क्या हैं इसके मायने?

BBC Hindi| पुनः संशोधित गुरुवार, 2 जून 2022 (07:49 IST)
में जातीय जनगणना करवाने के मुद्दे पर बुधवार को निर्णायक क़दम उठाया गया है। राज्य के सभी राजनीतिक दलों ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति से तय किया है कि कैबिनेट की अगली बैठक में निश्चित समय सीमा के भीतर जाति के आधार पर जनगणना कराने को मंज़ूरी दे दी जाएगी। जातिगत जनगणना में सभी धर्मों और संप्रदायों को शामिल किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने नौ राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करने के बाद पत्रकारों से बातचीत की।

उन्होंने कहा, "हम इसे जाति आधारित जनगणना कहेंगे। इसके ज़रिए समाज के सबसे उपेक्षित लोगों का डेटा बेस बनाने में मदद मिलेगी ताकि सबका विकास हो सके। कैबिनेट के ज़रिए इस जनगणना की समय सीमा तय करके विज्ञापन दिए जाएंगे। जाति जनगणना से जुड़े सभी फ़ैसले और क़दम हम सार्वजनिक करेंगें ताकि सबको इस बारे में मालूम रहे।"
बीजेपी में कोई हिचक नहीं: नीतीश
इस अहम फ़ैसले में सहयोगी बीजेपी की सहमति के बारे में नीतीश कुमार ने कहा कि बीजेपी में इस पर कोई हिचक नहीं है।

उन्होने पत्रकारों से कहा, "आप लोग ये ग़लत बात करते हैं कि बीजेपी विरोध कर रही है। 'विरोध' ग़लत शब्द है, जब पहले ही कहा जा चुका है कि राज्य अपने स्तर पर जातिगत जनगणना करा सकते है।"

हालांकि सीएम नीतीश कुमार चाहे बीजेपी का बचाव करते दिख रहे हों, लेकिन जातिगत जनगणना को लेकर बीजेपी न सिर्फ़ केंद्र बल्कि राज्य के स्तर पर भी हिचक रही है।
13 मई को ही दैनिक भास्कर में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल का एक बयान छपा, जिसमें उन्होंने कहा था, "हमारे लिए दो ही जातियां-अमीर और गरीब।"

इस बयान पर राजद ने अपने ट्विटर हैंडल से संजय जायसवाल को अपना नाम बदलकर 'संजय अमीर' या 'संजय ग़रीब' रखने की नसीहत दी थी।

दब्बू पिछड़ों की भागीदारी बढ़ेगी: संजय पासवान
दलित चिंतक और बीजेपी के नेता संजय पासवान इस बारे में कहते हैं, "बिहार में सवर्णों के हाथ से जब सत्ता गई, तो दबंग पिछड़ों के हाथ में आ गई, जबकि जिसे मैं 'दब्बू पिछड़ा' (अतिपिछड़ा) कहता हूं, वो पीछे रह गया। जातिगत जनगणना से जब इनकी संख्या सामने आएगी, तो सत्ता में इनकी भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।''
वो कहते हैं कि इस प्रक्रिया को ठीक वैसे ही समझना चाहिए, जैसे दलितों मे महादलितों की अलग श्रेणी बनाकर उनकी स्थिति बेहतर की गई।

हालांकि मौक़े-बेमौक़े पर जातिगत जनगणना को ख़ारिज करने वाली प्रदेश बीजेपी जातिगत जनगणना के मसले पर अहम मौक़ों पर नीतीश कुमार के साथ खड़ी नज़र जाती है। ऐसे में ये सवाल अहम है कि आख़िर बिहार बीजेपी की कश्मकश है क्या? और जातिगत जनगणना पर फिलहाल उसके समर्थन के क्या मायने हैं?
इस सवाल वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत प्रसाद कहते हैं, "बीजेपी का ये मानना रहा है कि जितना ज़्यादा जाति का वर्गीकरण होगा, हिंदुत्व का उसका एजेंडा उतना ही कमज़ोर होगा। लेकिन दो बातों के चलते पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं है। पहला, ये कि सवर्ण किसी एक प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं हैं, यानी वो किसी एक पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है। दूसरा, पिछड़ों-अति पिछड़ों के उभार की झलक आपको बिहार बीजेपी के संगठन और सत्ता में भी दिखती है। इन्हीं दो वजहों से बीजेपी न चाहते हुए भी इस मसले पर साथ में है।"
सभी जातियों में उथल-पुथल

जातीय पहचान के लिए बदनाम रहे बिहार में इस मुद्दे को लेकर सभी जातियों में उथल-पुथल तेज हो गई है।

बिहार बीजेपी भी पिछड़ों-अति पिछड़ों पर अपनी राजनीति को केंद्रित कर रही है। यही वजह है कि सम्राट अशोक की जाति कुशवाहा बताते हुए बीजेपी ने पहली बार पार्टी के स्तर पर अशोक जयंती मनाई। वहीं दूसरी तरफ़ विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव अब राजद को 'ए टू ज़ेड' की पार्टी बनाना चाहते हैं।
राजद ने 2020 में पटना ज़िले के विक्रम के बड़े ज़मींदार और उद्योगपति अमरेंद्रधारी सिंह को राज्यसभा भेजा। उसके बाद अप्रैल 2022 में विधान परिषद के चुनाव में पार्टी ने भूमिहार जाति के पांच उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से तीन जीते भी। वहीं कुछ हफ़्ते पहले बोचहां विधानसभा के उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार की जीत ने तेजस्वी के हौसले बुलंद कर दिए हैं।

इस बारे में दैनिक जागरण के स्टेट ब्यूरो हेड अरविंद शर्मा कहते हैं, "तेजस्वी में ये समझ मज़बूत होती जा रही है कि सिर्फ़ मुस्लिम यादव समीकरण के सहारे वो सत्ता में नहीं आ सकते। इसलिए वो अपनी पार्टी का विस्तार कर रहे हैं। इस विधान परिषद चुनाव में भी उन्होंने अशोक कुमार पांडेय को प्रत्याशी बनाया है। जहां तक जातिगत जनगणना की बात है, तो उस पर अभी राजनीति होगी और हो सकता है कि प्रशासनिक वर्ग आपको लगातार प्रशिक्षण में व्यस्त दिखें।"
नीतीश की पिछड़ों का मसीहा बनने की कोशिश
हालांकि जातियों में हो रही उथल-पुथल के बीच बिहार की राजनीति किस तरफ़ जाएगी? इस सवाल पर रमाकांत प्रसाद कहते हैं कि नीतीश कुमार चाहते हैं कि पिछड़ा-अतिपिछड़ा की राजनीति को केंद्र में लाकर राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही स्तर पर उनकी हिस्सेदारी बढ़ाई जाए।

प्रशासनिक हिस्सेदारी आरक्षण के ज़रिए बढ़ाई जा सकती है। मेरे ख़्याल से नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के सहारे राजनीति के इस ध्रुव को सिर्फ़ अपने सत्ता काल तक ही नहीं, बल्कि आगे भी साधना चाहते हैं। पिछड़ों के नेता के रूप में वो इतिहास में वैसे ही दर्ज़ होना चाहते हैं, जैसे दलितों के लिए आंबेडकर हुए।
नीतीश कुमार ने सर्वदलीय बैठक के बाद कहा, "बिहार की इस पहल के बाद दूसरे राज्यों में भी इस पर धीरे धीरे बात हो रही है।"

साफ है कि नीतीश ये कहकर कुछ इशारा करना चाहते हैं। रमाकांत प्रसाद कहते हैं, "नीतीश जताना चाहते हैं कि बीजेपी के सहयोगी दल होते हुए भी वो पिछड़ों-अति पिछड़ों के मसीहा हैं।"

जातिगत जनगणना में मुसलमान भी
इस बीच जातिगत जनगणना के सवाल में मुस्लिम समाज की भी इंट्री हो गई है। नीतीश कुमार ने जहां एक तरफ़ ये साफ़ कर दिया कि सभी धर्म-संप्रदाय की जाति-उपजाति की गिनती होगी, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं।
इससे पहले बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह ने कहा था कि मुसलमानों को भी जातिगत जनगणना में शामिल करना चाहिए।

बुधवार की सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए एआईएमआईएम के अख़्तरुल ईमान ने गिरिराज सिंह के बयान पर बीबीसी से कहा, "मुसलमानों की जाति-उपजाति का आकलन होना चाहिए। बाकी बीजेपी का काम है कि वो मुसलमानों को चिढ़ाने वाली बात करती रहे, लेकिन इस पर ज़्यादा तवज़्ज़ो देने की ज़रूरत नहीं है।"
नीतीश सरकार बीते चार साल से जातिगत जनगणना को लेकर प्रयास कर रही है। बिहार विधानमंडल में इसके पक्ष में फ़रवरी 2019 और 2020 में एक प्रस्ताव पारित हुआ था। उसके बाद अगस्त 2021 में बिहार के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करके जातिगत जनगणना कराने की मांग की थी।

अब जब नीतीश सरकार ने जातिगत जनगणना कराने की ओर एक और क़दम बढ़ा दिया है, तब यह देखना होगा कि यह काम कब तक ठोस आकार ले लेता है और इसके नतीज़े राज्य की राजनीति पर कैसा असर डाल पाते हैं?

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