सिंहासन बत्तीसी : तीसवीं पुतली जयलक्ष्मी की कहानी

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विक्रम को अब जिज्ञासा हुई कि वह मनुष्यों की भांति बोल तो रहा है मगर मनुष्य में परिवर्तित नहीं हुआ है। उन्होंने उससे पूछा- 'तुम्हें मृग रूप से कब मुक्ति मिलेगी? कब तुम अपने वास्तविक रूप को प्राप्त करोगे?

वह श्रापित राजकुमार बोला- 'इससे भी मुझे मुक्ति बहुत शीघ्र मिल जाएगी। उस योगी के कथनानुसार मैं अगर आपको साथ लेकर उसके पास जाऊं तो मेरा वास्तविक रूप मुझे तुरन्त ही वापस मिल जाएगा।'

विक्रम खुश थे कि उनके हाथ से शापग्रस्त राजकुमार की हत्या नहीं हुई अन्यथा उन्हें निरपराध मनुष्य की हत्या का पाप लग जाता और वे ग्लानि तथा पश्चाताप की आग में जल रहे होते। उन्होंने मृगरूपी राजकुमार से पूछा- 'क्या तुम्हें उस योगी के निवास के बारे में कुछ पता है? क्या तुम मुझे उसके पास लेकर चल सकते हो?'
उस राजकुमार ने कहा- 'हां, मैं आपको उसकी कुटिया तक अभी लिए चल सकता हूं। संयोग से वह योगी अभी भी इसी जंगल में थोड़ी दूर पर साधना कर रहा है।'

वह मृग आगे-आगे चला और विक्रम उसका अनुसरण करते-करते चलते रहे। थोड़ी दूर चलने के पश्चात उन्हें एक वृक्ष पर उलटा होकर साधना करता एक योगी दिखा। उनकी समझ में आ गया कि राजकुमार इसी योगी की बात कर रहा था। वे जब समीप आए तो वह योगी उन्हें देखते ही वृक्ष से उतरकर सीधा खड़ा हो गया। उसने विक्रम का अभिवादन किया तथा दर्शन देने के लिए उन्हें नतमस्तक होकर धन्यवाद दिया।



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